RBI का ऑफशोर रुपया ट्रेड पर नियंत्रण का दांव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश के बाहर हो रहे रुपया डेरिवेटिव सौदों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसका मकसद करेंसी मार्केट में आ रहे भारी उतार-चढ़ाव (volatility) को नियंत्रित करना है। फरवरी 2027 तक लागू होने वाला यह नया नियम बाज़ार में अधिक पारदर्शिता लाएगा और बेहतर प्राइस डिस्कवरी (price discovery) में मदद करेगा। हालांकि, यह अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रथाओं को चुनौती देता है और वैश्विक बैंकों की ओर से इसका ज़ोरदार विरोध हो रहा है। RBI का लक्ष्य एक महत्वपूर्ण सूचना गैप को भरना है, जिसने हाल के दिनों में भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
नियामक आदेश क्या कहता है?
RBI चाहती है कि बैंक ऑफशोर रुपया डेरिवेटिव सौदों में से कम से कम 70% की रिपोर्टिंग करें। इसका मकसद एक निष्पक्ष प्रणाली बनाना है, क्योंकि भारत में घरेलू बैंक पहले से ही अपनी विदेशी शाखाओं सहित अपने सभी सौदों की रिपोर्ट करते हैं। RBI को उस बाज़ार की गहरी समझ चाहिए जिसका रुपये के मूल्य पर काफी असर पड़ता है, खासकर जब उसने घरेलू खिलाड़ियों के लिए कुछ ऑफशोर बाज़ारों को मंजूरी दी थी। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि कुछ सौदों ने विदेशी मुद्रा बाज़ार में अस्थिरता बढ़ाई है। हाल ही में सट्टा (speculative) पोजीशन से बाहर निकलने से रुपये को कुछ हद तक रिकवरी मिली है। हाल ही में USD/INR की दर लगभग 92.6050 थी, जिसने पिछले साल की गिरावट के मुकाबले थोड़ी रिकवरी दिखाई। इससे पहले, RBI ने बैंकों की नेट ओपन पोजीशन (net open position) सीमित करने और ऑफशोर नॉन-डिलिवरबल फॉरवर्ड्स (NDFs) पर प्रतिबंध जैसे नरम उपाय भी किए थे।
अधिकार क्षेत्र की चुनौतियां और बाज़ार पहुंच
यह नियम वैश्विक बैंकों के काम करने के तरीके और उनके कानूनी दायित्वों से टकराता है। विदेशी बैंकों का तर्क है कि ऑफशोर सौदों की रिपोर्टिंग उनके अपने देशों के डेटा सुरक्षा और गोपनीयता कानूनों का उल्लंघन कर सकती है। उन्हें चिंता है कि RBI का अधिकार क्षेत्र भारत से बाहर भी बढ़ रहा है। उनका मानना है कि ऐसे नियम के लिए अन्य केंद्रीय बैंकों के साथ मुश्किल समन्वय की आवश्यकता होगी। 2008 के बाद से वैश्विक वित्तीय सुधारों ने पारदर्शिता बढ़ाने और व्यवस्थित जोखिम (systemic risk) को कम करने के लिए व्यापार रिपोर्टिंग को केंद्रीय निकायों को अनिवार्य बनाने पर जोर दिया है। यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका (US) जैसे देश कुछ ओवर-द-काउंटर (OTC) डेरिवेटिव के लिए क्लियरिंग को अनिवार्य बनाते हैं, और बैंक ऑफ इजरायल (Bank of Israel) अपनी मौद्रिक नीति के लिए रिपोर्टिंग की मांग करता है। लेकिन RBI की ऑफशोर रुपया सौदों की विशिष्ट मांग, अन्य देशों के घरेलू रिपोर्टिंग नियमों की तुलना में एक अलग चुनौती पेश करती है।
रुपया की अस्थिरता का संदर्भ
मार्च में रुपये में आई हालिया गिरावट, जो छह वर्षों में सबसे खराब रही, कई कारकों के कारण थी। इनमें वैश्विक राजनीतिक अनिश्चितताएं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और उभरते बाजारों (emerging markets) में सामान्य मंदी शामिल थी। RBI का यह कदम इस अस्थिरता को स्थिर करने का प्रयास है, लेकिन ऑफशोर बाज़ार की महत्वपूर्ण भूमिका, जो अप्रैल 2025 में लगभग $60 बिलियन के क्रॉस-बॉर्डर सौदों के साथ था, पर कड़ी निगरानी रखना अहम है।
विदेशी बैंकों की आपत्तियां और संभावित प्रभाव
जबकि RBI के हस्तक्षेप से अल्पावधि में मुद्रा स्थिरता मिलती है, यह वैश्विक ऋणदाताओं के लिए जोखिम और परेशानियां भी पैदा करता है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के यह कहने के बावजूद कि ये कदम अस्थायी हैं, नीतिगत अप्रत्याशितता और भारत के वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ एकीकरण के दौरान संभावित घर्षण को लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं। इन बदलावों के कारण पहले ही पोजीशन का तेजी से अनवाइंडिंग (unwinding) हुआ है, जिससे बैंकों को अनुमानित ₹40-50 बिलियन का भारी नुकसान हो सकता है। विदेशी बैंकों की मुख्य शिकायत नियामक की कथित अत्यधिक पहुंच (regulatory overreach) और उनके गृह देशों के कानूनों के साथ टकराव है, क्योंकि उन्हें भारत के बाहर किए गए सौदों के लिए रिपोर्टिंग आवश्यकताओं को समस्याग्रस्त लगता है। यह उन्हें घरेलू फर्मों की तुलना में नुकसान में डालता है, जो पहले से ही व्यापक रिपोर्टिंग का सामना करते हैं। RBI का तर्क है कि भारत में लाइसेंस प्राप्त बैंक, चाहे सौदे कहीं भी हों, उसके रिपोर्टिंग नियमों के अधीन हैं। अधिकार क्षेत्र पर यह असहमति onshore और offshore रुपया कीमतों के बीच के अंतर को काफी चौड़ा कर सकती है, जिससे offshore प्रीमियम बढ़ सकता है और लिक्विडिटी (liquidity) कम हो सकती है। हेजिंग लागत (hedging costs) में वृद्धि भी बाजार के खिलाड़ियों को प्रभावित करती है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा जोखिमों का प्रबंधन करना कठिन हो जाता है और संभावित रूप से भविष्य में निवेश को हतोत्साहित किया जा सकता है। फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने कहा है कि हालांकि भारतीय बैंक स्थिर माहौल में काम करते हैं, नियामक कार्रवाइयां नेट इंटरेस्ट मार्जिन (net interest margins) को कम कर सकती हैं और मुनाफे को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे की राह
वर्तमान असहमति के बावजूद, RBI का मुद्रा बाजारों को गहरा करने और रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने का घोषित लक्ष्य एक दीर्घकालिक योजना का संकेत देता है, जिसमें इन उपायों को समायोजित किया जा सकता है। गवर्नर मल्होत्रा ने कहा है कि वर्तमान प्रतिबंध अस्थायी हैं। यह स्थिति केंद्रीय बैंकों के लिए चल रही चुनौती को उजागर करती है: मुद्रा स्थिरता की आवश्यकता को एक खुले, अनुमानित और विश्व स्तर पर जुड़े बाजार को बनाए रखने के साथ संतुलित करना। यह मैंडेट सफल होगा या नहीं, यह RBI के इन प्रतिस्पर्धी जरूरतों को विदेशी निवेशक के विश्वास को नुकसान पहुंचाए बिना या प्रमुख विदेशी मुद्रा बाजारों में बड़ी तरलता (liquidity) की समस्याएं पैदा किए बिना प्रबंधित करने के कौशल पर निर्भर करेगा।