भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 1 जुलाई से प्रोपराइटरी ट्रेडिंग (Proprietary Trading) के लिए कड़े नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत, कोलैटरल के तौर पर गिरवी रखे गए शेयरों पर **40%** का हेयरकट लगेगा। RBI ने डोमेस्टिक ब्रोकर्स को बैंक से मिलने वाले कर्ज को सीमित करके बैंकिंग सिस्टम के रिस्क को कम करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को चिंता है कि इससे भारतीय फर्मों के ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकते हैं, जो विदेशी कंपनियों की तुलना में ज्यादा होंगे, और इसका असर रिटेल निवेशकों के लिए मार्केट लिक्विडिटी और ट्रेडिंग स्प्रेड पर पड़ सकता है।
क्या है नया नियम?
1 जुलाई से लागू हो रहे इन नए नियमों के तहत, बैंक अब प्रोपराइटरी ट्रेडिंग के लिए ब्रोकर्स को आसानी से पैसा उधार नहीं दे पाएंगे। प्रोपराइटरी ट्रेडिंग का मतलब है जब कोई फर्म अपने खुद के पैसे से शेयर, डेरिवेटिव और दूसरे फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स में ट्रेडिंग करती है, न कि क्लाइंट के पैसों से। RBI ने कहा है कि इस तरह की गतिविधियों के लिए कर्ज देने पर काफी पाबंदियां होंगी, सिवाय मार्केट-मेकिंग (Market-Making) के कुछ छोटे अपवादों के।
इसके अलावा, RBI ने यह भी अनिवार्य कर दिया है कि ट्रेडिंग फर्मों को दिए जाने वाले सभी लोन पूरी तरह से कोलैटरल (Collateral) से सुरक्षित होने चाहिए। गिरवी रखे गए शेयरों पर 40% का हेयरकट लगाया जाएगा। इसका मतलब है कि अगर कोई फर्म ₹100 करोड़ के शेयर गिरवी रखती है, तो वह उनके बदले केवल ₹60 करोड़ का ही लोन ले पाएगी।
40% हेयरकट का मतलब
ट्रेडिंग फर्मों के लिए, 'हेयरकट' का मतलब है कि वे जिस संपत्ति को लोन के लिए सिक्योरिटी के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके मूल्य में जो छूट दी जाती है। 40% का हेयरकट लगाकर RBI ने भारतीय प्रोपराइटरी ट्रेडिंग फर्मों की उधार लेने की क्षमता को काफी कम कर दिया है। पहले, कई फर्म कम कैपिटल के साथ ज्यादा वॉल्यूम में ट्रेड करने के लिए ज्यादा लीवरेज (Leverage) का इस्तेमाल करती थीं। इस नए नियम के तहत बैंक गारंटी के लिए 50% कैश बैकिंग की भी जरूरत होगी, जिससे डोमेस्टिक ब्रोकर्स की ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध लिक्विडिटी (Liquidity) और भी टाइट हो जाएगी।
डोमेस्टिक बनाम फॉरेन फर्म्स?
इंडस्ट्री में इस बात को लेकर काफी चिंता है कि इन नियमों से एक असंतुलन पैदा हो सकता है। रेगुलेशन के आलोचकों का कहना है कि जहां डोमेस्टिक भारतीय फर्मों पर RBI के ये सख्त नियम लागू होंगे, वहीं फॉरेन एंटिटीज (Foreign Entities) - जैसे फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर (FPI) या गिफ्ट सिटी (GIFT City) के जरिए ऑपरेट करने वाली कंपनियां - बैंक से लोन लेने के मामले में RBI के दायरे में नहीं आती हैं। इससे इंटरनेशनल ट्रेडिंग हाउसेज को सस्ती ऑफ-शोर फंडिंग (Offshore Funding) मिलती रहेगी। इंडस्ट्री पार्टिसिपेंट्स का तर्क है कि इससे एक अनइवन प्लेइंग फील्ड (Uneven Playing Field) बन रहा है, जहां भारतीय फर्मों को उधार लेने की लागत ज्यादा चुकानी पड़ सकती है और उनकी क्षमता कम हो सकती है, जबकि उनके ग्लोबल कॉम्पिटिटर्स पर इसका कोई असर नहीं होगा।
मार्केट लिक्विडिटी पर असर
लिक्विडिटी का मतलब है कि कितने आसानी से किसी स्टॉक को बिना बड़े प्राइस मूवमेंट के खरीदा या बेचा जा सकता है। प्रोपराइटरी ट्रेडिंग फर्म अक्सर 'मार्केट मेकर्स' (Market Makers) होती हैं, जो लगातार बाय (Buy) और सेल (Sell) ऑर्डर देकर लिक्विडिटी प्रदान करती हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि नए कैपिटल कंस्ट्रेंट्स (Capital Constraints) घरेलू फर्मों को अपना ऑपरेशन कम करने पर मजबूर कर सकते हैं। अगर ये फर्म कम ट्रेड करेंगी, तो इससे बिड-आस्क स्प्रेड (Bid-Ask Spread) - यानी खरीदने और बेचने के भाव का अंतर - बढ़ सकता है। रिटेल निवेशकों के लिए, बढ़ा हुआ स्प्रेड ट्रेड में एंट्री या एग्जिट को महंगा बना देगा, जिससे डेरिवेटिव मार्केट की ओवरऑल एफिशिएंसी पर असर पड़ सकता है।
RBI ने क्यों कसे शिकंजे?
सेंट्रल बैंक का मुख्य मकसद बैंकिंग सेक्टर में सिस्टमिक रिस्क (Systemic Risk) को मैनेज करना है। जब मार्केट में ज्यादा वोलेटिलिटी (Volatility) होती है और इक्विटी की कीमतें तेजी से गिरती हैं, तो ब्रोकर्स को मार्जिन कॉल्स (Margin Calls) का सामना करना पड़ सकता है जिन्हें वे पूरा नहीं कर पाते। अगर बैंकों ने इन ब्रोकर्स को भारी कर्ज दिया हुआ है, तो बैंकों को भी फाइनेंशियल रिस्क का सामना करना पड़ता है। 40% हेयरकट को अनिवार्य करके, RBI एक बफर बना रहा है ताकि शेयर की कीमतों में भारी गिरावट आने पर भी बैंक का लोन कोलैटरल से सुरक्षित रहे। यह पॉलिसी ऐसे हालात को रोकने के लिए बनाई गई है जहां मार्केट क्रैश बैंकिंग सिस्टम में अस्थिरता पैदा कर दें।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले महीनों में निवेशकों को कुछ खास बातों पर नजर रखनी चाहिए। सबसे पहले, ब्रोकरेज फर्मों से उनके ऑपरेशनल कॉस्ट और भविष्य के ट्रेडिंग वॉल्यूम के बारे में कोई कमेंट्री आती है या नहीं, इस पर ध्यान दें। दूसरे, डेरिवेटिव सेगमेंट में ओवरऑल मार्केट लिक्विडिटी और बिड-आस्क स्प्रेड्स पर नजर रखें कि कहीं कोई खास सख्ती तो नहीं देखी जा रही। आखिर में, किसी भी रेगुलेटरी क्लेरिफिकेशन (Regulatory Clarification) या इंडस्ट्री की तरफ से ऐसी किसी रिप्रेजेंटेशन पर नजर रखें जिससे इन नियमों में कोई बदलाव आ सकता है, क्योंकि इंडस्ट्री अभी भी डोमेस्टिक ट्रेडिंग कैपेसिटी पर इसके लॉन्ग-टर्म असर का आकलन कर रही है।
