KCC स्कीम में RBI का बड़ा डिजिटल बूस्ट
RBI ने जो ड्राफ्ट पेश किया है, उसके मुताबिक किसानों को अब ₹10,000 से लेकर ₹50,000 तक का क्रेडिट लिमिट मिल सकता है। यह लिमिट उनकी जमीन और फसल की योजना के आधार पर तय होगी। खास बात यह है कि अब खेती में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी, जैसे मिट्टी की जांच (soil testing) और मौसम की सटीक जानकारी (weather forecasts) का खर्च भी लोन में शामिल किया जाएगा। यह राशि कुल लोन का 20% तक हो सकती है, और इसका इस्तेमाल farm asset maintenance और allied services के लिए भी किया जा सकेगा।
फसल चक्र (crop seasons) को भी अब स्टैंडर्ड बनाया गया है। छोटी अवधि की फसलों के लिए 12 महीने का साइकिल होगा, जबकि लंबी अवधि की फसलों के लिए 18 महीने का। इतना ही नहीं, KCC की अवधि को बढ़ाकर छह साल तक कर दिया गया है, ताकि किसानों को लंबी खेती की अवधियों के हिसाब से बेहतर सुविधा मिल सके। यह सब 12 फरवरी, 2026 को जारी किए गए ड्राफ्ट का हिस्सा है, जिस पर 6 मार्च, 2026 तक जनता से सुझाव मांगे गए हैं।
एग्रीकल्चरल क्रेडिट में ग्रोथ और डिजिटल अपनाना
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत के एग्रीकल्चरल क्रेडिट (agricultural credit) में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। पिछले एक दशक में, Ground Level Credit (GLC) का लक्ष्य ₹8 लाख करोड़ (FY 2014-15) से बढ़कर ₹27.5 लाख करोड़ (FY 2024-25) हो गया है। 31 दिसंबर, 2024 तक, ₹19.28 लाख करोड़ का लोन बांटा जा चुका था, जो सालाना लक्ष्य का 70% था।
KCC स्कीम, जिसे 1998 में शुरू किया गया था, इस विस्तार का एक अहम हिस्सा रही है। दिसंबर 2024 तक, 7.72 करोड़ से ज्यादा किसानों को इसका फायदा मिला और KCC खातों से ₹10.05 लाख करोड़ का लोन बांटा गया। किसानों के बीच डिजिटल पेमेंट अपनाने की रफ्तार भी तेज हुई है। 2022 में जहां यह आंकड़ा 11% था, वहीं 2024 की शुरुआत में यह बढ़कर 43% हो गया। UPI और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन पर बढ़ती निर्भरता ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। RBI भी क्रेडिट निकालने के लिए मोबाइल-आधारित ट्रांजैक्शन और विभिन्न डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म जैसे मल्टी-चैनल एक्सेस पर जोर दे रहा है।
बैंकों के लिए संभावित जोखिम
हालांकि, इन बदलावों से बैंकिंग सेक्टर के लिए कुछ नई चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं। छह साल की लंबी अवधि और बढ़ती लोन लिमिट के साथ, किसानों पर क्रेडिट का बोझ (leverage) बढ़ सकता है। खेती में हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है, जैसे बाजार की खराब हालत या फसल का खराब होना। अगर ऐसे में किसानों की आय स्थिर नहीं रही, तो एग्रीकल्चरल सेक्टर में पहले से मौजूद नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) का आंकड़ा और बढ़ सकता है।
बैंकों को नई टेक्नोलॉजी से जुड़े खर्चों का मूल्यांकन करने और बड़े क्रेडिट एक्सपोजर को मैनेज करने में ऑपरेशनल कॉम्प्लेक्सिटी (operational complexity) का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, गांवों में डिजिटल लिटरेसी, इंटरनेट कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी अभी भी एक बड़ी बाधा है। इससे RBI की डिजिटल ड्रॉडाउन और रीपेमेंट की योजनाएं पूरी तरह सफल नहीं हो पाएंगी। पुरानी KCC स्कीम में भी लोन की अपर्याप्त सीमा और जटिल प्रक्रियाओं जैसी दिक्कतें थीं, जिनकी वजह से किसान अक्सर अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज लेने को मजबूर होते थे।
भविष्य की राह
कुल मिलाकर, RBI का यह कदम एग्रीकल्चरल क्रेडिट सिस्टम को मजबूत करने और वित्तीय समावेशन (financial inclusion) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। टेक्नोलॉजी और डिजिटल पहुंच पर जोर देकर, केंद्रीय बैंक किसानों के लिए क्रेडिट को अधिक सुलभ, समय पर और किफायती बनाने का लक्ष्य रख रहा है। इस नई KCC स्कीम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंकिंग सेक्टर इन जोखिमों को कितनी प्रभावी ढंग से संभालता है और किसान इन सुविधाओं का लाभ उठा पाते हैं या नहीं।