RBI का बड़ा कदम: 100% कॉलेटरल और प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग पर रोक
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरीज (CMIs) के लिए क्रेडिट नियमों में बड़ा बदलाव किया है। 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, बैंकों को ब्रोकर और इसी तरह की संस्थाओं को दिए गए हर लोन के एवज में 100% टेंजिबल एसेट्स (tangible assets) कॉलेटरल के तौर पर रखने होंगे। इतना ही नहीं, प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग (proprietary trading) गतिविधियों के लिए बैंक से मिलने वाले फाइनेंस पर भी पाबंदी लगा दी गई है, सिवाय मार्केट-मेकिंग (market-making) जैसी खास ज़रूरतों के। इंडस्ट्री बॉडी ANMI ने इन नियमों पर चिंता जताते हुए छह महीने का एक्सटेंशन मांगा है। उनका कहना है कि बैंक गारंटी के लिए कॉलेटरल को 50% से बढ़ाकर 100% करने से प्रोप्राइटरी मार्केट मेकर्स (proprietary market makers) और आर्बिट्रेज डेस्क (arbitrage desks) के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
लिक्विडिटी पर असर और मार्केट पर प्रभाव
जानकारो का मानना है कि यह कदम ट्रेडिंग की इकोनॉमी को पूरी तरह बदल देगा। ईक्विटी शेयरों को कॉलेटरल के तौर पर इस्तेमाल करने पर लगने वाले 40% हेयरकट (haircut) का मतलब है कि ₹100 करोड़ के शेयरों पर अब केवल ₹60 करोड़ का ही लोन मिल पाएगा, जिससे लीवरेज (leverage) काफी कम हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा असर प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग फर्मों पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, जो फर्म ₹50 करोड़ की ईक्विटी पर ₹150 करोड़ का बैंक फाइनेंस लेकर काम कर रही थी, अब वह केवल ₹50 करोड़ ही लगा पाएगी। 2024 में प्रोप्राइटरी डेस्क ने इक्विटी ऑप्शंस टर्नओवर का 50% से अधिक और कैश ईक्विटी टर्नओवर का लगभग 30% योगदान दिया था। ऐसे में, बैंक फाइनेंसिंग में कमी से ट्रेडिंग वॉल्यूम घट सकता है, खासकर डेरिवेटिव्स (derivatives) और ऑप्शंस (options) मार्केट में। अनुमान है कि ऑप्शंस ट्रेडिंग में 15% से 20% तक की गिरावट आ सकती है। इससे बिड-आस्क स्प्रेड (bid-ask spreads) बढ़ सकते हैं और सभी निवेशकों के लिए ट्रांजैक्शन कॉस्ट (transaction cost) महंगी हो सकती है। बाजार की शुरुआती प्रतिक्रिया इसी चिंता को दर्शाती है, जहां BSE और Angel One जैसे इंटरमीडियरीज के शेयरों में 16 फरवरी 2026 को 10% तक की गिरावट देखी गई।
डोमेस्टिक फर्मों के लिए चुनौतियां और कॉम्पिटिटिव गैप
नई रेगुलेशंस कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी सेक्टर के लिए कई खतरे पैदा करती हैं। छोटे और इंडिपेंडेंट ब्रोकर्स, जो बैंक लाइन्स पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, मुश्किल में पड़ सकते हैं। इसके विपरीत, बड़ी और अच्छी पूंजी वाली फर्मों को कॉम्पिटिटिव फायदा मिलेगा। प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग के लिए बैंक फाइनेंसिंग पर लगी रोक इन फर्मों को अपने इंटरनल कैपिटल और रिटेन्ड अर्निंग्स (retained earnings) पर ज्यादा निर्भर रहने पर मजबूर करेगी, जिससे उनके बिजनेस मॉडल में फंडामेंटली बदलाव आएगा। इस कैपिटल इंटेंसिटी (capital intensity) के कारण ग्रोथ धीमी हो सकती है, खासकर उन फर्मों के लिए जो आर्बिट्रेज और मार्केट-मेकिंग जैसी हाई-वॉल्यूम, लो-मार्जिन स्ट्रैटेजी पर काम करती हैं और जिन्हें सस्ते व आसानी से उपलब्ध फाइनेंस की ज़रूरत होती है। इसके अलावा, डोमेस्टिक इंटरमीडियरीज और फॉरेन प्लेयर्स के बीच फाइनेंसिंग के विकल्पों में बड़ा अंतर कॉम्पिटिटिव चिंता का विषय है। जबकि डोमेस्टिक फर्मों को सख्त कॉलेटरल नियमों का सामना करना पड़ रहा है, फॉरेन एंटिटीज (entities) ओवरसीज बैंकों या स्टैंडबाय लेटर्स ऑफ क्रेडिट (standby letters of credit) के जरिए कैपिटल जुटा सकती हैं, जिससे एक अनइवन प्लेयिंग फील्ड (uneven playing field) तैयार हो रहा है। ANMI ने बताया है कि कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी सेगमेंट में ऐतिहासिक रूप से लगभग शून्य नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) रहे हैं, और ₹1.2 लाख करोड़ की आउटस्टैंडिंग बैंक गारंटी में 2008 या COVID-19 महामारी जैसे संकटों के दौरान भी कोई इन्वोकेशन (invocation) नहीं देखा गया। हालांकि, नए नियम लिक्विडिटी प्रोविजन पर गलत तरीके से असर डाल सकते हैं, जिससे मार्केट वोलेटिलिटी (volatility) बढ़ सकती है, खासकर अगर ग्लोबल फाइनेंशियल कंडीशंस (financial conditions) और टाइट हो जाती हैं।
भविष्य की ओर: स्थिरता पर जोर
RBI का मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम को कैपिटल मार्केट वोलेटिलिटी से बचाना और स्पेकुलेटिव लीवरेज को कंट्रोल करना है, ताकि सिस्टमैटिक स्टेबिलिटी (systemic stability) बनी रहे। हालांकि, इससे लंबे समय में एक मजबूत फाइनेंशियल इकोसिस्टम (financial ecosystem) बन सकता है, लेकिन इस बदलाव के दौरान ट्रेडिंग वॉल्यूम, ब्रोकर की कमाई और मार्केट लिक्विडिटी पर शॉर्ट-टर्म दबाव देखने को मिल सकता है। RBI की लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशंस (liquidity management operations) की इफेक्टिवनेस, जिसने पहले ही काफी इंजेक्शन्स और एब्जॉर्प्शन (injections and absorptions) देखे हैं, व्यापक मार्केट डिसरप्शन्स (market disruptions) को कम करने में अहम भूमिका निभाएगी। इंडस्ट्री को बिजनेस मॉडल में रीकैलिब्रेशन (recalibration) की उम्मीद है, जिसमें कैपिटल एफिशिएंसी (capital efficiency) और बैलेंस शीट स्ट्रेंथ (balance sheet strength) पर ज्यादा फोकस होगा, जो की कॉम्पिटिटिव डिफरेंशियेटर्स (competitive differentiators) बनेंगे। फॉरेन इन्वेस्टर पार्टिसिपेशन (foreign investor participation) और इंडियन कैपिटल मार्केट्स की ओवरऑल डेप्थ (depth) पर लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि डोमेस्टिक इंटरमीडियरीज कितनी अच्छी तरह अडैप्ट (adapt) करती हैं और क्या रेगुलेटरी आर्बिट्रेज (regulatory arbitrage) के मौके बनते हैं।