RBI का दांव: बैंकों को राहत, पर जोखिम RBI के सिर?

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AuthorMehul Desai|Published at:
RBI का दांव: बैंकों को राहत, पर जोखिम RBI के सिर?
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की इस तिमाही की गई बड़ी बॉन्ड खरीद बैंकों को बढ़ती यील्ड (yield) से निपटने में मदद कर रही है। ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) के तहत करीब **₹3.5 लाख करोड़** के इन खरीद सौदों से वैश्विक घटनाओं के कारण हुए नुकसान को कम करने में मदद मिली है। हालांकि, इससे लंबी अवधि का महत्वपूर्ण बॉन्ड जोखिम RBI की बैलेंस शीट पर स्थानांतरित हो गया है।

बढ़ती यील्ड से बैंकों को मिली बड़ी राहत, RBI की भूमिका अहम

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकारी सिक्योरिटी यील्ड (government security yields) में आई तेज उछाल से बैंकिंग सेक्टर को बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इस तिमाही में ₹3.5 लाख करोड़ के ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) के जरिए RBI ने बैंकों की बॉन्ड पोर्टफोलियो वैल्यूएशन में हो रहे नुकसान को कम करने में मदद की है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक मॉनेटरी पॉलिसी में बदलावों के कारण यील्ड में तेजी आई थी, जिसने बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। RBI की इस दखलअंदाजी ने फौरी राहत तो दी है, लेकिन लंबी अवधि का बॉन्ड जोखिम अब केंद्रीय बैंक के कंधों पर आ गया है।

यील्ड का तेज़ चढ़ाव और RBI का हस्तक्षेप

इस साल जनवरी से अब तक बेंचमार्क 10-साल की सरकारी सिक्योरिटी यील्ड 35 बेसिस पॉइंट से ज्यादा बढ़ चुकी है, जिसमें सिर्फ मार्च महीने में 28 बेसिस पॉइंट का इजाफा हुआ। यह वृद्धि 2022 के रेट-हाइकिंग साइकल के स्तरों को छू रही है, जिसने बैंकों के बॉन्ड पोर्टफोलियो पर दबाव डाला है। हालांकि OMOs और स्विच ऑक्शन में हिस्सेदारी से बैंकों को कुछ सहारा मिला है, लेकिन सरकारी और बड़े प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को बॉन्ड वैल्यूएशन में कुछ नुकसान झेलना पड़ सकता है। RBI की सक्रिय भागीदारी, जिसके तहत इस फाइनेंशियल ईयर में करीब ₹9 लाख करोड़ के बॉन्ड खरीदे गए हैं, ने संभावित नुकसान के एक बड़े हिस्से को अवशोषित कर लिया है। RBI के इन आक्रामक खरीद से यील्ड को सीमित करने और सिस्टम में आवश्यक लिक्विडिटी (liquidity) डालने में मदद मिली है। यह RBI की लिक्विडिटी प्रबंधन की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

बैंकिंग सेक्टर में मिली-जुली राहत

RBI के इस कदम से पूरे बैंकिंग सिस्टम को फायदा तो हुआ है, लेकिन राहत का स्तर एक समान नहीं है। जिन बैंकों ने OMO खरीद और स्विच ऑपरेशंस में सक्रिय रूप से भाग लिया है, वे बेहतर स्थिति में हैं। वहीं, कुछ अन्य बैंकों को अपने ट्रेजरी बुक्स (treasury books) पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। निफ्टी बैंक इंडेक्स में भी 27 मार्च 2026 को 52,274.60 के आसपास उतार-चढ़ाव देखा गया, जो बाज़ार की धारणा और यील्ड की बदलती गतिशीलता को दर्शाता है। ऐसे समय में जब नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में कमी आई है, बैंकों की ट्रेजरी इनकम कमाई का एक महत्वपूर्ण जरिया रही है, जिस पर यील्ड की चाल का असर पड़ा है। जहाँ पिछली तिमाहियों में ट्रेजरी से मिले मुनाफे ने 'अन्य आय' (other income) को बढ़ाया था, वहीं मौजूदा बढ़ती यील्ड का माहौल इन लाभों को सीमित कर रहा है। भारतीय बैंकों जैसे इंडियन बैंक का P/E रेश्यो 10.2x से 10.84x के बीच है, जो निवेशक मूल्यांकन को दर्शाता है।

RBI की बैलेंस शीट पर बढ़ता जोखिम

RBI की बड़े पैमाने पर बॉन्ड खरीद, जो बैंकों के लिए फायदेमंद है, ने केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट का महत्वपूर्ण विस्तार किया है और लंबी अवधि का बॉन्ड जोखिम अपने ऊपर ले लिया है। यह रणनीति, जो लिक्विडिटी की कमी या बाज़ार में तनाव के दौरान अपनाई जाती है, RBI को तात्कालिक बाज़ार दबावों को संभालने की अनुमति देती है। हालांकि, सरकारी सिक्योरिटीज का एक बड़ा पोर्टफोलियो जमा करने से भविष्य में चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। RBI ऐतिहासिक रूप से OMOs के माध्यम से सरकारी बॉन्ड अपनी किताबों में रखता आया है, जो प्रभावी रूप से सरकार को उधार देने जैसा है। यह हस्तक्षेप सरकार के उधार की वास्तविक लागत को छिपा सकता है और भविष्य में मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन को जटिल बना सकता है, खासकर अगर RBI को अपनी बैलेंस शीट का प्रबंधन करना पड़े।

यील्ड को बढ़ाने वाले वैश्विक कारक

इस तिमाही में यील्ड में वृद्धि के पीछे वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के कारकों का हाथ है। इनमें पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि, रुपए में कमजोरी और विदेशी पोर्टफोलियो का बहिर्वाह शामिल है। ये कारक उभरते बाज़ारों के डेट (debt) के लिए भू-राजनीतिक झटकों और वैश्विक ब्याज दर की चालों के प्रति ऐतिहासिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। 10-साल के सरकारी बॉन्ड पर यील्ड 27 मार्च 2026 को 6.94% पर बंद हुई, जो एक साल पहले 6.58% थी। वैश्विक कारकों के कारण भारतीय बाज़ारों में लगातार दबाव बना हुआ है।

RBI की बॉन्ड खरीद के दीर्घकालिक जोखिम

RBI द्वारा OMOs के माध्यम से सरकारी उधार का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित करने की रणनीति अल्पावधि में यील्ड को स्थिर करती है और बैंकिंग लिक्विडिटी का प्रबंधन करती है। हालाँकि, यह RBI की बैलेंस शीट पर लंबी अवधि के बॉन्ड जोखिम को केंद्रित करती है। इससे सरकारी उधार की वास्तविक लागत छिप सकती है और केंद्रीय बैंक के भविष्य के पॉलिसी लचीलेपन को सीमित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, सरकार के लिए उधार की लागत को कृत्रिम रूप से दबाए रखने से मोरल हैजर्ड (moral hazard) पैदा हो सकता है।

बॉन्ड यील्ड का आउटलुक

विश्लेषकों का अनुमान है कि RBI के हस्तक्षेप से बॉन्ड की कीमतों को सहारा मिलता रहेगा और यील्ड में अत्यधिक वृद्धि को रोका जा सकेगा। लेकिन, वैश्विक कारकों से उत्पन्न होने वाला मुद्रास्फीति का दबाव और सरकार की भारी उधार आवश्यकताएं यील्ड को ऊँचाई पर बनाए रखेंगी। आने वाले फाइनेंशियल ईयर में भी सरकारी प्रतिभूतियों की आपूर्ति बनी रहने की उम्मीद है, जो यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव बनाए रखेगी।

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