भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सेंट्रल बैंक के बीच दुबई में अहम बैठक हुई। इसका मकसद भारत की फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट स्कीम को लेकर आ रही दिक्कतों को दूर करना था, ताकि विदेश में रहने वाले भारतीयों (NRIs) से ज़्यादा से ज़्यादा डॉलर जुटाए जा सकें।
डिपॉजिट जुटाने में क्यों आ रही हैं मुश्किलें?
RBI और UAE सेंट्रल बैंक (CBUAE) के बीच हुई इस हाई-लेवल मीटिंग में भारत की फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट स्कीम में आ रही अड़चनों पर बात हुई। यह स्कीम भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) को मजबूत करने और रुपये को सहारा देने के लिए बेहद अहम है। मौजूदा स्कीम के तहत, बैंकों को 3 से 5 साल की मैच्योरिटी वाली फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट पर 7.5% तक के इंटरेस्ट रेट पर हेजिंग कॉस्ट (हेजिंग लागत) में मदद मिल रही है।
रेगुलेटरी चिंताएं और बैंकों का ऑपरेशन
बैठक में एक बड़ा मुद्दा UAE के स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZs) में चल रहे बैंकों के ऑपरेशन को लेकर था। UAE के रेगुलेटर्स को चिंता है कि ये बैंक कहीं लोकल UAE क्लाइंट्स की बजाय भारतीय कंपनियों के लिए फंड जुटाने को ज़्यादा प्राथमिकता न दें। इसके अलावा, कुछ छोटी बैंकों को लोकल रेगुलेटर्स से इस बात की चेतावनी भी मिली है कि वे भारतीय बैंकों को ज़्यादा लीवरेज (उधार) न दें, क्योंकि इससे क्षेत्र से कैपिटल का आउटफ्लो (पूंजी का बाहर जाना) बहुत ज़्यादा हो सकता है।
इन रेगुलेटरी कदमों से नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) और लेंडर्स (कर्ज देने वाले) के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है। अगर रिप्रेजेंटेटिव ऑफिस पर कोई पाबंदी लगाई जाती है, तो इससे भारत में डॉलर डिपॉजिट के फ्लो (आने वाले पैसे) पर असर पड़ सकता है। निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि बैंकों के लिए फंड जुटाने की कॉस्ट (लागत) बढ़ सकती है, जिससे उन्हें विदेशी डिपॉजिटर्स को ऑफर किए जाने वाले रिटर्न को एडजस्ट करना पड़ सकता है।
रणनीतिक महत्व और पिछली मिसालें
RBI का यह कदम 2013 के टेपर टैंट्रम (taper tantrum) की याद दिलाता है, जब भारत ने इसी तरह की डिपॉजिट स्कीमों से करीब $34 बिलियन जुटाए थे। UAE, भारत में भेजे जाने वाले कुल रेमिटेंस (विदेश से भेजा जाने वाला पैसा) का लगभग 20% हिस्सा रखता है, इसलिए यह सेंट्रल बैंक के लक्ष्यों के लिए एक महत्वपूर्ण जगह है। मार्केट के अनुमानों के मुताबिक, अगर मौजूदा स्कीम सफल होती है, तो यह बड़ी मात्रा में कैपिटल अट्रैक्ट कर सकती है। हालांकि, $60 बिलियन से $80 बिलियन जैसे बड़े टारगेट को हासिल करने के लिए शायद और ज्यादा आक्रामक इंटरेस्ट रेट या हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) के लिए खास प्रोडक्ट्स की ज़रूरत पड़ सकती है।
आगे क्या?
इस फंड जुटाने की मुहिम की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि RBI, UAE में इन रेगुलेटरी अड़चनों से कितनी अच्छी तरह निपट पाता है। निवेशकों को NRI कस्टमर्स की ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) प्रोसेस और डिपॉजिट इंटरेस्ट रेट्स में किसी भी संभावित बदलाव पर नज़र रखनी चाहिए। भारतीय बैंकों की क्षमता, UAE रेगुलेटर्स की चिंताओं को दूर करते हुए स्थिर फंडिंग कॉस्ट बनाए रखने में, देश की फॉरेन एक्सचेंज पोजीशन को सपोर्ट करने के लिए कितनी कैपिटल जुटाई जा सकती है, यह तय करने में एक महत्वपूर्ण फैक्टर होगी।
