केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब सरकारी बैंकों पर विदेशी मुद्रा (foreign currency) जमा राशि को तेजी से आकर्षित करने का दबाव बना रहे हैं। यह कदम बढ़ते ग्लोबल आर्थिक दबावों के बीच विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और रुपये को स्थिर करने की रणनीति का हिस्सा है।
बैंकों को कसी नकेल
भारतीय सरकार ने विदेशी मुद्रा (foreign currency) के प्रवाह को बढ़ाने के लिए एक बड़ी कवायद शुरू की है। सरकारी बैंकों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) से बड़ी मात्रा में जमा राशि आकर्षित करें। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को सरकारी बैंकों के प्रमुखों के साथ बैठक की। इस बैठक में उन्होंने वैश्विक भारतीय समुदाय के लिए बेहतर डिजिटल पहुंच (digital outreach) और नए फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स लाने की जरूरत पर जोर दिया। यह कदम देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और रुपये को सहारा देने के लिए उठाया गया है, जो क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों और ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता के कारण दबाव में है।
RBI और बैंकों के बीच तालमेल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। गवर्नर शक्तिकांत दास मंगलवार को निजी और सरकारी बैंकों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEOs) से मिलने वाले हैं। इस मीटिंग का मुख्य मकसद उन ऑपरेशनल दिक्कतों की पहचान करना और उन्हें दूर करना है, जो विदेशी फंड के प्रवाह को धीमा कर रही हैं। इन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके, केंद्रीय बैंक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारतीय समुदाय के लिए अपनी बचत को देश के बैंकिंग इंस्ट्रूमेंट्स में डालना आसान हो जाए।
पिछला अनुभव और प्रोत्साहन
विदेशी पूंजी के लिए यह जोर पहली बार नहीं है। साल 2013 में, जब ग्लोबल मार्केट में 'टेपर टैंट्रम' (taper tantrum) का दौर चल रहा था, तब सरकार की ऐसी ही एक पहल से करीब $34 बिलियन आए थे, जिसने घरेलू मुद्रा को स्थिर करने में मदद की थी। आज बैंकों को प्रोत्साहित करने के लिए, RBI ने कुछ सहायक उपाय पेश किए हैं। इसमें 3 से 5 साल की मैच्योरिटी वाली फॉरेन करेंसी डिपॉजिट्स के लिए फुल हेजिंग-कॉस्ट सपोर्ट (full hedging-cost support) शामिल है। इन प्रोत्साहनों से बैंकों को 7.5% तक आकर्षक ब्याज दरें देने का मौका मिल रहा है, जो नॉन-रेजिडेंट निवेशकों के लिए स्थिर रिटर्न की तलाश में काफी अहम है।
GIFT City और ग्लोबल हब का इस्तेमाल
बैंकों को गुजरात के गिफ्ट सिटी (GIFT City) में स्थित इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर (International Financial Services Centre) का बेहतर उपयोग करने की भी सलाह दी गई है। यह हब विदेशी बाजारों से पूंजी जुटाने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है। बैंक अधिकारियों ने सिंगापुर, हांगकांग, मध्य पूर्व, यूके और यूएसए जैसे प्रमुख फाइनेंशियल हब में रहने वाले भारतीयों से मजबूत प्रतिक्रिया देखी है। इन डिपॉजिट प्रोग्राम्स और विदेश में पूंजी जुटाने की भारतीय कंपनियों की अच्छी मांग के समर्थन से, फाइनेंशियल सेक्टर को आने वाली अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में फंड जुटाने में खास बढ़ोतरी की उम्मीद है। निवेशक और बाजार पर्यवेक्षक आने वाले महीनों में इन प्रयासों की प्रभावशीलता और विदेशी मुद्रा भंडार में इसके परिणामस्वरूप होने वाली वृद्धि पर नजर रखेंगे।
