रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने NBFCs के गोल्ड लोन पोर्टफोलियो को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। जून 2026 की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (FSR) में RBI ने कहा है कि गोल्ड लोन सेगमेंट में तेजी से ग्रोथ देखने को मिल रही है और यह अब हाउसिंग के अलावा सबसे बड़ा रिटेल लेंडिंग सेगमेंट बन गया है। हालांकि, मौजूदा समय में लेंडर्स के पास पर्याप्त कोलेटरल बफर हैं, लेकिन RBI ने यह भी चेताया है कि कुछ NBFCs में कुछ ही बड़े उधारकर्ताओं पर कंसंट्रेशन का जोखिम गंभीर दबाव की स्थिति में भारी पड़ सकता है।
क्या है मामला?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के फाइनेंशियल सिस्टम में गोल्ड लोन (Gold Loan) के तेजी से बढ़ते विस्तार पर चिंता जताई है। 30 जून 2026 को जारी अपनी लेटेस्ट फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (FSR) में, केंद्रीय बैंक ने बताया कि मार्च 2024 से गोल्ड लोन में 42.4% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ोतरी हुई है। यह ग्रोथ रेट अन्य नॉन-हाउसिंग रिटेल लोन (जिनमें 23% की ग्रोथ देखी गई) से कहीं ज्यादा है। RBI ने यह भी कहा कि जहां सोने की कीमतों में बढ़ोतरी से बरोअर्स को ज्यादा लोन मिल पा रहा है, वहीं इस क्रेडिट कंसंट्रेशन (Credit Concentration) पर रेगुलेटर की नजर है।
गोल्ड लोन की बढ़ती डिमांड के पीछे क्या है?
इस लेंडिंग बूम की सबसे बड़ी वजह सोने की कीमतों में आई तेजी है। जैसे-जैसे गिरवी रखे सोने का मूल्य बढ़ा, बरोअर्स बड़ी लोन राशि लेने में सक्षम हुए। वहीं, लेंडर्स के लिए लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो कम हुआ। एक निचला LTV रेश्यो लेंडर के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है। यानी, गिरवी रखे हर ₹100 के सोने पर, लेंडर ने कम उधार दिया है, जो सोने की कीमतों में गिरावट की स्थिति में एक कुशन प्रदान करता है। RBI ने देखा कि LTV रेश्यो में इस कमी से फिलहाल बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) दोनों के लिए कोलेटरल प्रोटेक्शन मजबूत हुआ है।
कंसंट्रेशन रिस्क की समस्या
हालांकि आज के समय में कोलेटरल बफर मजबूत दिख रहे हैं, लेकिन RBI के स्ट्रेस टेस्ट में NBFC सेक्टर के अंदर कुछ खास कमजोरियां सामने आई हैं। केंद्रीय बैंक ने एक महत्वपूर्ण कंसंट्रेशन रिस्क को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ NBFCs में टॉप तीन बड़े बरोअर्स के डिफॉल्ट (Default) होने पर भी उनके कैपिटल पोजीशन (Capital Position) पर काफी असर पड़ सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि ऐसे डिफॉल्ट से सेक्टर का कैपिटल-टू-रिस्क-वेटेड एसेट्स रेशियो (CRAR) – जो कि लेंडर की वित्तीय मजबूती और नुकसान झेलने की क्षमता का माप है – 230 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकता है।
गंभीर काल्पनिक स्ट्रेस परिदृश्यों के तहत, केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि कुछ NBFCs का CRAR न्यूनतम रेगुलेटरी आवश्यकता 15% से नीचे जा सकता है। इसके अलावा, अत्यधिक परिस्थितियों में सेक्टर के लिए ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPAs) में भी काफी बढ़ोतरी देखी जा सकती है। हालांकि, RBI ने यह निष्कर्ष निकाला कि कुल मिलाकर, NBFC सेक्टर की कैपिटल पोजीशन ऐसे झटकों को झेलने के लिए पर्याप्त लचीली बनी हुई है।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
NBFCs में निवेश करने वालों के लिए, RBI की यह चेतावनी सिर्फ ग्रोथ से हटकर लोन बुक की क्वालिटी और डाइवर्सिटी पर ध्यान केंद्रित करने की है। गोल्ड लोन में हाई ग्रोथ रेट अच्छी बात है, लेकिन यह कंसंट्रेशन रिस्क को छिपा सकती है, खासकर तब जब ग्रोथ का बड़ा हिस्सा कुछ ही बड़े बरोअर्स द्वारा संचालित हो। अगर ये कुछ बड़े बरोअर्स डिफॉल्ट करते हैं, तो लेंडर की प्रॉफिटेबिलिटी और कैपिटल एडिक्वेसी (Capital Adequacy) पर इसका बहुत ज्यादा असर पड़ सकता है।
आगे क्या मॉनिटर करें?
निवेशकों को आने वाले तिमाही नतीजों (Quarterly Results) में सिर्फ हेडलाइन ग्रोथ नंबर्स से आगे देखना चाहिए। कुछ मुख्य क्षेत्र जिन पर नजर रखी जा सकती है, वे हैं:
- कंसंट्रेशन मेट्रिक्स (Concentration Metrics): गोल्ड लोन सेगमेंट में टॉप 10 या टॉप 20 बरोअर एक्सपोजर (Borrower Exposures) से संबंधित खुलासे।
- मैनेजमेंट कमेंट्री (Management Commentary): मैनेजमेंट की बरोअर बेस को डाइवर्सिफाई करने और संभावित कंसंट्रेशन रिस्क को कम करने की योजनाएं।
- एसेट क्वालिटी (Asset Quality): अगर सोने की कीमतों में अचानक उतार-चढ़ाव आता है, तो गोल्ड लोन पोर्टफोलियो के परफॉर्मेंस पर नजर रखना।
- कैपिटल एडिक्वेसी (Capital Adequacy): NBFCs के निवेशक प्रेजेंटेशन में CRAR लेवल्स की जांच करना, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे रेगुलेटरी मिनिमम से पर्याप्त बफर बनाए हुए हैं।
