RBI ने बैंकों के लिए 'ऑपरेशनल रिस्क कैपिटल' कैलकुलेशन को लेकर सख्त गाइडलाइंस जारी कर दी हैं, जो 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगी। यह नया ढांचा बैंकों के कैपिटल बफर को और अधिक मजबूत बनाएगा, जिसका सीधा असर बैंकों की बैलेंस शीट और रिटर्न रेशियो पर पड़ सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सेक्टर की मजबूती के लिए बड़ा कदम उठाया है। 1 अप्रैल 2027 से बैंकों को अपने ऑपरेशनल रिस्क कैपिटल की गणना के लिए नए और सख्त नियमों का पालन करना होगा। यह कदम वैश्विक Basel III मानकों के साथ तालमेल बैठाने के लिए उठाया गया है, ताकि बैंक किसी भी संभावित आर्थिक झटके को झेलने के लिए पहले से बेहतर तरीके से तैयार रहें।
क्या बदलेगा नियमों में?
पुराने और अनुमानित तरीकों को हटाकर अब एक स्टैंडर्ड फ्रेमवर्क लाया गया है। इसके तहत बैंकों को अपनी वित्तीय गतिविधियों को तीन श्रेणियों में बांटना होगा: Interest, Lease and Dividend Component, Services Component, और Financial Component।
खास बात यह है कि जिन बैंकों के पास बड़े ट्रेडिंग डेस्क हैं, उन्हें अब इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव्स को उनके पॉजिटिव फेयर वैल्यू पर मापना होगा, न कि नोशनल वैल्यू पर। इससे बैंक अपनी जोखिमों को छुपा नहीं पाएंगे और पारदर्शिता बढ़ेगी।
डेटा और नुकसान का हिसाब
RBI ने 'इंटरनल लॉस मल्टीप्लायर' के लिए भी स्टैंडर्ड तरीका तय कर दिया है। बैंकों को अब 10 साल तक का पुराना लॉस डेटा इस्तेमाल करना होगा। इस कैलकुलेशन में ऑपरेशनल फाइन, एनपीए (NPA), और संपत्ति के नुकसान को भी स्पष्ट रूप से शामिल करना होगा। हालांकि, मानव संसाधन और लॉजिस्टिक्स जैसे गैर-वित्तीय आउटसोर्सिंग खर्चों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।
निवेशकों पर असर
शेयरधारकों के लिए यह जानना जरूरी है कि अगर बैंकों की कैपिटल जरूरतें बढ़ती हैं, तो उन्हें ज्यादा इक्विटी को साइड में रखना होगा। इससे बैंकों के Return on Equity (ROE) पर दबाव बढ़ सकता है। जिन बैंकों का पिछला रिकॉर्ड खराब रहा है या जिन्हें ज्यादा रेगुलेटरी फाइन देने पड़े हैं, उन पर इसका असर अधिक देखने को मिल सकता है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में बैंक मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि वे इस नई चुनौती से निपटने के लिए क्या रणनीति अपना रहे हैं।
