रुपये में अचानक क्यों आई मजबूती?
रुपये में आई ये अचानक मजबूती किसी बड़े आर्थिक सुधार का नतीजा नहीं है, बल्कि यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा किए गए संरचनात्मक बदलावों का सीधा असर है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) के प्रति नरम रुख अपनाकर RBI ने घरेलू सरकारी सिक्योरिटीज मार्केट में बेहतर रिटर्न की तलाश कर रहे वैश्विक फंडों के लिए निवेश की लागत को प्रभावी ढंग से कम कर दिया है। इस नीतिगत बदलाव का मकसद एक स्थिर, गैर-सट्टा पूंजी प्रवाह बनाना है, जो मध्य पूर्व में अस्थिरता के कारण होने वाले पूंजी बहिर्वाह (Capital Outflows) का मुकाबला कर सके।
रणनीतिक लिक्विडिटी और बड़ा बदलाव
सिर्फ विदेशी भागीदारी की अनुमति देने से आगे बढ़कर, RBI ने 15, 30 और 40 साल के बॉन्ड्स को फुली एक्सेसिबल रूट (Fully Accessible Route) के तहत शामिल करने का फैसला किया है। यह लंबे समय के लिए विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का एक प्रयास है। जनरल रूट (General Route) के निवेशकों के लिए कंसंट्रेशन लिमिट और सिक्योरिटी-स्पेसिफिक एक्सपोजर कैप को हटाने से पहले की अड़चनें दूर हो गई हैं, जो बड़े संस्थानों को निवेश से रोक रही थीं। 2023 की मुद्रा अस्थिरता के दौरान RBI के पिछले कदमों की तुलना में, RBI पहले से ही बाहरी खाता घाटे (External Account Deficit) को प्रबंधित करने की स्थिति में दिख रहा है, जिसमें तेल की ऊंची कीमतों के कारण और बढ़ोतरी का जोखिम है। जहां बाजार की नजरें तुरंत 50 पैसे की बढ़त पर हैं, वहीं असली फायदा निर्यात आय वसूली अवधि (Export Proceeds Realization Period) को नौ महीने तक बहाल करना है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन की दिक्कतों का सामना कर रहे निर्यातकों को राहत मिलेगी।
जोखिम भरा दांव?
इन इनफ्लो (Inflow) से उत्साह के बावजूद, यह कदम लंबे समय में बड़ी कमजोरी पैदा कर सकता है। विदेशी कर्ज निवेश को आक्रामक रूप से प्रोत्साहित करके, RBI अनजाने में घरेलू बाजार को वैश्विक ब्याज दर चक्रों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है। यदि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yields) ऊंची बनी रहती हैं या और बढ़ती हैं, तो इन नई विदेशी देनदारियों के सर्विसिंग की लागत तेजी से बढ़ सकती है, जिससे पूंजी प्रवाह में अचानक उलटफेर हो सकता है। इसके अलावा, ऑथोराइज्ड डीलर बैंकों के लिए स्वैप सुविधाओं (Swap Facilities) और हेजिंग समर्थन पर निर्भरता बताती है कि बाजार की लिक्विडिटी अभी भी नाजुक है। आलोचकों का तर्क है कि ये उपाय अतीत के स्टॉप-गैप हस्तक्षेपों जैसे ही हैं, जो अल्पकालिक रूप से सफल तो थे, लेकिन अक्सर भारतीय व्यापार संतुलन की अंतर्निहित संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करने में विफल रहे। यदि बाहरी जोखिम प्रीमियम (External Risk Premiums) में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के RBI के वादे का इम्तिहान हो सकता है, क्योंकि ऐसे पूंजी बहिर्वाह को किसी भी नियामक ढील से पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता।
भविष्य का नजरिया और नीतिगत दिशा
बाजार सहभागियों की नजरें अब सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Undertakings) के लिए रियायती स्वैप सुविधा के कार्यान्वयन पर टिकी हैं, जो सितंबर के अंत में समाप्त हो रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ये उपाय एक अस्थायी स्थिरता प्रदान करते हैं, लेकिन रुपये की चाल ऊर्जा आयात और वैश्विक जोखिम भूख (Global Risk Appetite) के रुझान से अटूट रूप से जुड़ी रहेगी। केंद्रीय बैंक विनिमय दर पर तटस्थ सार्वजनिक रुख बनाए हुए है, फिर भी इन संरचनात्मक परिवर्तनों का पैमाना मुद्रा के मूल्य में एक अनियंत्रित गिरावट से बचने के लिए संस्थागत प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।
