Reserve Bank of India (RBI) ने अपनी स्पेशल फॉरेन करेंसी स्वैप विंडो को समय से पहले 31 अगस्त, 2026 को बंद करने का फैसला लिया है। इस सुविधा के जरिए देश में **$72.85 बिलियन** का विदेशी फंड आया है, जिसने रुपये को ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
करेंसी स्टेबिलिटी और RBI का मास्टरस्ट्रोक
जून 2026 में शुरू की गई इस स्वैप फैसिलिटी का मकसद विदेशी मुद्रा को देश में लाना और घरेलू करेंसी मार्केट में अस्थिरता को कम करना था। आंकड़ों के मुताबिक, इस कुल राशि में से $65.40 बिलियन सिर्फ FCNR(B) डिपॉजिट्स से आए हैं। बाकी फंड ओवरसीज फॉरेन करेंसी और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स के जरिए जुटाया गया है। Citi India के CEO, K Balasubramanian का मानना है कि RBI के इन कदमों ने रुपये को ग्लोबल मार्केट के बड़े झटकों से सुरक्षित रखा है और सट्टेबाजों पर लगाम लगाई है।
क्यों बंद की जा रही है विंडो?
विंडो को तय समय से एक महीना पहले बंद करने का साफ मतलब है कि RBI ने अपना लिक्विडिटी टारगेट हासिल कर लिया है। अब सेंट्रल बैंक को मार्केट में और ज्यादा इंटरवेंशन की जरूरत नहीं दिख रही है, जिससे अब मार्केट दोबारा नॉर्मल तौर पर कामकाज की ओर लौटेगा।
आगे क्या हैं चुनौतियां?
भले ही अभी सब कुछ स्थिर दिख रहा हो, लेकिन निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। यदि तेल के दाम बढ़ते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ेगी और रुपये पर दबाव बनेगा। इसके अलावा, ग्लोबल लेवल पर जियो-पॉलिटिकल तनाव और ब्याज दरों में बदलाव भी रुपया के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं। अगर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजारों से पैसा निकालना शुरू किया, तो बाजार को फिर से बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
