RBI ने पेमेंट एग्रीगेटर्स के लिए नियमों में बड़ा फेरबदल किया
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ताज़ा निर्देशों से पेमेंट एग्रीगेटर्स (PAs) के काम करने और रेगुलेशंस का पालन करने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब PAs को मर्चेंट्स को जोड़ने (onboarding) के लिए सेंट्रल केवाईसी रिकॉर्ड्स रजिस्ट्री (CKYCR) का इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा। इसका मतलब है कि PAs को अब मर्चेंट्स का वेरिफिकेशन खुद करना होगा, न कि बैंकों पर निर्भर रहना होगा। इसका मकसद एक ज़्यादा सुरक्षित और पता लगाने योग्य सिस्टम तैयार करना है, ताकि बिज़नेस को गलत तरीके से वर्गीकृत होने से रोका जा सके और मनी लॉन्ड्रिंग व अवैध सट्टेबाजी जैसी गैर-कानूनी गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सके।
कड़ा KYC और बढ़ी हुई कैपिटल की मांग
PAs को अब अपने मर्चेंट ऑनबोर्डिंग प्रोसेस में CKYCR को इंटीग्रेट करना होगा। यदि CKYCR डेटा उपलब्ध नहीं है, तभी फिजिकल डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बेहतर जांच के लिए सेंट्रल डेटा का उपयोग करने की दिशा में एक कदम है। RBI ने कैपिटल की ज़रूरत को भी बढ़ाया है। नॉन-बैंक PAs को आवेदन करते समय मिनिमम ₹15 करोड़ का नेट वर्थ (Net Worth) दिखाना होगा, जो कि मंज़ूरी मिलने के तीन साल के अंदर बढ़कर ₹25 करोड़ हो जाएगा। यह बढ़ी हुई कैपिटल, साथ ही सख़्त कंप्लायंस (Compliance) नियम, खासकर छोटे PAs के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी करेंगे। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि इससे बाज़ार में कंसॉलिडेशन (consolidation) तेज़ होगा, जिससे मजबूत फाइनेंसियल और एस्टेब्लिश्ड कंप्लायंस सिस्टम वाले PAs को फायदा होगा।
क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स का विस्तार, लेकिन कुछ सीमाओं के साथ
नए नियम क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट एग्रीगेटर्स (PA-CBs) को लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत ज़्यादा ट्रांजैक्शन्स को संभालने की भी इजाज़त देते हैं। इसमें शिक्षा, यात्रा और मेडिकल ज़रूरतों के साथ-साथ ई-कॉमर्स के पेमेंट शामिल हैं, जो नए ग्रोथ के अवसर प्रदान करते हैं। हालांकि, एक मुख्य सीमा बनी हुई है: PAs सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की LRS लिमिट को चेक नहीं कर सकते। उन्हें यह कन्फर्म करने के लिए बैंकों से पूछना होगा कि वह व्यक्ति सालाना USD 250,000 की लिमिट के अंदर है या नहीं। इस चेक के लिए बैंकों पर निर्भर रहने से देरी हो सकती है और कंप्लायंस नियम और जटिल हो सकते हैं।
चुनौतियां: बढ़ती लागत और रिस्क
सख़्त नियमों से PAs की ऑपरेटिंग कॉस्ट (operating cost) में सीधा इजाफा होगा। गहन KYC करना, ज़्यादा सख़्त एस्क्रो अकाउंट (escrow account) मैनेज करना, और ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग व रिपोर्टिंग के लिए नई टेक्नोलॉजी में निवेश करने से मुनाफे पर दबाव पड़ेगा। छोटे मर्चेंट्स के लिए, आसान KYC रूट के बावजूद कुछ टर्नओवर लिमिट्स को पूरा करना होगा और शायद पहले से ज़्यादा सख़्त जांच का सामना करना पड़े। CKYCR का उपयोग, डेटा को स्टैण्डर्डाइज़ करने के लिए अच्छा है, लेकिन यह इंटीग्रेशन इश्यूज़ (integration issues) पैदा कर सकता है और PAs को रजिस्ट्री की एक्यूरेसी पर निर्भर बना सकता है। PAs पर्सन-टू-पर्सन मनी ट्रांसफर की सुविधा भी नहीं दे पाएंगे, जिससे कुछ सेवाओं पर सीमाएं लग सकती हैं। नए क्रॉस-बॉर्डर सर्विसेज़ की अपनी संभावनाएं हैं, लेकिन इनमें अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय नियमों और फॉरेन एक्सचेंज कंप्लायंस से जुड़े रिस्क भी शामिल हैं। PAs का ग्राहकों के लिए LRS लिमिट चेक करने हेतु बैंकों पर निर्भर रहना इस प्रक्रिया को और मुश्किल बनाता है। मर्चेंट्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके PA के पास RBI का वैलिड लाइसेंस हो और वे नियमित रूप से KYC अपडेट कराते रहें, वरना उनके अकाउंट सस्पेंड हो सकते हैं।
भविष्य का नज़रिया: एक बंटा हुआ पेमेंट सेक्टर
RBI का यह अपडेट, जो सितंबर 2025 के आसपास फाइनल होने की उम्मीद है, पेमेंट इंडस्ट्री को बांट देगा। जो PAs ज़्यादा कंप्लायंस कॉस्ट झेलने और CKYCR व बेहतर वेरिफिकेशन मेथड्स को इंटीग्रेट करने में सक्षम होंगे, वे मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाएंगे। छोटे प्लेयर्स कैपिटल और ऑपरेशनल डिमांड्स के साथ संघर्ष कर सकते हैं, जिससे वे बिक सकते हैं या मार्केट से बाहर हो सकते हैं। बाज़ार का अनुमान है कि आने वाले समय में कम, लेकिन बड़े PAs होंगे, और कुछ ख़ास (niche) प्लेयर्स कम नज़र आएंगे। नए मर्चेंट्स के लिए फुल KYC की डेडलाइन 1 जनवरी 2026 है, और मौजूदा मर्चेंट्स के लिए 15 सितंबर 2026 है। ये वो मुख्य तारीखें हैं जिन पर सेक्टर के एडजस्ट होने के दौरान नज़र रखनी होगी।