RBI का कड़ा रुख: ऑनशोर पोजीशन पर नई सीमाएं
RBI ने शुक्रवार को यह बड़ा निर्देश जारी किया है, जिसके तहत ऑथराइज्ड डीलर्स (authorised dealers) को ऑनशोर करेंसी मार्केट (onshore currency market) में अपनी ओपन पोजीशन (open positions) को रोजाना 100 मिलियन डॉलर तक सीमित रखना होगा। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले बैंक अपनी कैपिटल (capital) का 25% तक पोजीशन रख सकते थे। इस कदम का मकसद रुपये पर दबाव बनाने वाली सट्टेबाजी (speculation) को रोकना माना जा रहा है। डॉलर खरीदने और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (Non-Deliverable Forwards - NDF) के जरिए इसे ऑफशोर बेचने वाले बैंकों को 10 अप्रैल तक इस नियम का पालन करना होगा। मौजूदा पोजीशन का पैमाना काफी बड़ा है, जो करीब 30 बिलियन डॉलर बताया जा रहा है। इससे मार्केट में एक बड़ी करेक्शन की संभावना है। शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 94.8150 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था, जो RBI की कार्रवाई की गंभीरता को दर्शाता है।
रुपये की गिरावट और मार्केट पर असर
इस साल भारतीय रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है, जो फरवरी के अंत से 4% से अधिक गिर चुका है। इसकी वजहें वैश्विक तेल की ऊंची कीमतें, ईरान में चल रहे संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक तनाव, भारत के ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) का बढ़ना और महंगाई (inflation) की चिंताएं हैं। RBI का कदम रुपये के बहिर्वाह (outflow) को रोकना चाहता है, लेकिन बैंकों का तर्क है कि इतनी बड़ी पोजीशन को कम समय में अनवाइंड (unwind) करने से भारी नुकसान होगा और ऑनशोर मार्केट में बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने पड़ सकते हैं। यह जबरन डॉलर बिक्री, ट्रेडिंग फिर से शुरू होने पर रुपये में अचानक और तेज मजबूती ला सकती है। ऐसी अस्थिरता उन बैंकों के लिए परेशानी खड़ी करेगी जिन्होंने डॉलर के मुकाबले शॉर्ट पोजीशन (short positions) बना रखी हैं। क्षेत्रीय मुद्राओं जैसे इंडोनेशियाई रुपिया (IDR) और मलेशियाई रिंगित (MYR) की तुलना में रुपये में अधिक गिरावट देखी गई है, जो भारत के फॉरेक्स मार्केट की खास कमजोरी या आक्रामक सट्टेबाजी की ओर इशारा करता है। RBI के पिछले हस्तक्षेपों ने अक्सर अल्पकालिक स्थिरता दी है, लेकिन बाद में गिरावट आई और इंडस्ट्री ने मार्केट में होने वाले व्यवधान पर नाराजगी जताई।
बैंकों की चिंताएं और संभावित नतीजे
जबकि RBI का लक्ष्य करेंसी की स्थिरता बनाए रखना है, इस हस्तक्षेप की आक्रामकता व्यापक प्रणालीगत मुद्दों (systemic issues) का जोखिम पैदा करती है। 10 अप्रैल तक बड़ी ओपन पोजीशन को बंद करने का आदेश कई संस्थानों के लिए असंभव हो सकता है, जिससे अचानक डॉलर की मांग और मुद्रा में अचानक उतार-चढ़ाव हो सकता है, बजाय इसके कि यह एक व्यवस्थित समायोजन हो। यदि बैंक भारी नुकसान उठाए बिना इन सीमाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो वे एक्सटेंशन (extensions) या रियायतों के लिए लॉबिंग कर सकते हैं, जिससे अनिश्चितता पैदा होगी और RBI की नीति कमजोर होगी। 30 बिलियन डॉलर की भारी भरकम पोजीशन का पैमाना बताता है कि मार्केट NDF आर्बिट्रेज (arbitrage) की रणनीतियों पर बहुत अधिक निर्भर हो गया था। अचानक रोक लगने से बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरियां और उभरते बाजारों (emerging markets) के प्रति सेंटिमेंट उजागर हो सकते हैं, खासकर महंगाई और ट्रेड डेफिसिट जैसे मैक्रोइकॉनोमिक दबावों को देखते हुए। वित्तीय वर्ष के अंत (fiscal year-end) के साथ इसका समय बैलेंस शीट के प्रबंधन और रिपोर्टिंग में जटिलता जोड़ता है। यह नीति, हालांकि रुपये की रक्षा के लिए आवश्यक प्रतीत होती है, बहुत रूखी होने का जोखिम उठाती है, जिससे तरलता (liquidity) को नुकसान पहुंच सकता है और भारतीय व्यवसायों के लिए हेजिंग लागत (hedging costs) बढ़ सकती है।
रुपये का भविष्य क्या?
CR Forex Advisors ने निकट भविष्य के लिए रुपये का अनुमान 92.50-92.80 प्रति डॉलर के बीच लगाया है, जो शुक्रवार के 94.8150 के स्तर से काफी अलग है। हालांकि, इस अनुमान की सफलता बैंकों की अनुपालन क्षमता और उसके बाद के बाजार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी। रुपये में संभावित तेज उछाल उन लोगों को फायदा पहुंचा सकता है जो लॉन्ग पोजीशन (long positions) में हैं, लेकिन शॉर्ट पोजीशन वाले संस्थानों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। RBI का सख्त रुख और बैंकिंग क्षेत्र की प्रतिक्रिया आने वाले हफ्तों में रुपये की दिशा तय करेगी, जिसमें अस्थिरता लगभग निश्चित है।