RBI की स्पेशल फॉरेक्स स्वैप सुविधा के तहत कुल **$136.38 अरब** की भारी-भरकम रकम जुटाई गई है। इस कदम से बैंकों को सस्ते फंड का सहारा मिला है और लिक्विडिटी सरप्लस बढ़ा है, जिसे मैनेज करने के लिए अब केंद्रीय बैंक ने रिवर्स रेपो ऑक्शन का रास्ता अपनाया है।
उम्मीद से कहीं ज्यादा रही आवक
31 अगस्त, 2026 को समाप्त हुई इस विशेष स्वैप सुविधा ने मार्केट की उम्मीदों को पीछे छोड़ दिया है। बाजार का अनुमान था कि $70 अरब से $80 अरब की फंडिंग आएगी, लेकिन हकीकत में यह आंकड़ा $136.38 अरब तक पहुंच गया। इसमें से बड़ा हिस्सा यानी $127.23 अरब केवल FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए आया है, जो भारतीय बैंकिंग सिस्टम के लिए विदेशी मुद्रा का एक बड़ा और स्थिर स्रोत बन गया है।
बैंकिंग सेक्टर और लिक्विडिटी पर असर
यह पैसा बैंकों के लिए 'लाइफलाइन' साबित हो रहा है। इन डिपॉजिट्स पर CRR और SLR की शर्तें लागू नहीं होतीं, जिससे बैंकों की फंड जुटाने की लागत (Cost of Borrowing) काफी कम हो गई है। इसका सीधा असर लिक्विडिटी पर दिखा है, जो सितंबर के शुरुआती दिनों में ₹10 लाख करोड़ के पार निकल गई।
इतनी ज्यादा लिक्विडिटी से महंगाई का खतरा न बढ़े, इसके लिए RBI ने मोर्चा संभाल लिया है। 8 सितंबर, 2026 को सेंट्रल बैंक ने ₹5 लाख करोड़ का वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन किया, ताकि सिस्टम से फालतू पैसा सोखा जा सके और ब्याज दरें स्थिर बनी रहें।
आगे की राह और रिस्क
इस लिक्विडिटी का मुख्य लक्ष्य क्रेडिट ग्रोथ बढ़ाना है ताकि अर्थव्यवस्था में तेजी आए। हालांकि, इसके कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। सबसे बड़ा डर 'एबनॉर्मल लेंडिंग' का है—यानी जल्दबाजी में बिना उचित जांच-परख के लोन बांटना। साथ ही, अगर बाजार में अचानक से बहुत ज्यादा कैश आया, तो इससे महंगाई (Inflation) बढ़ने का भी रिस्क बना रहेगा।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
RBI फिलहाल एक बेहद नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। निवेशकों को आने वाले समय में सेंट्रल बैंक की लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशन्स पर नजर रखनी होगी, खासकर VRRR ऑक्शन के साइज पर। इसके अलावा, आने वाली तिमाहियों में क्रेडिट ग्रोथ का डेटा यह साफ करेगा कि बैंक इस अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल कितनी जिम्मेदारी और समझदारी के साथ कर रहे हैं।
