भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के फॉरेक्स रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) को बूस्ट करने के लिए एक बड़ी चाल चली है। RBI अब FCNR(B) डिपॉजिट्स और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECBs) की स्वैप कॉस्ट (Swap Cost) खुद उठाएगा। इसका मकसद नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) से विदेशी मुद्रा को आकर्षित करना है। इसके जवाब में SBI और दूसरे बड़े बैंक तेजी से हाई-यील्ड प्रोडक्ट्स (High-yield products) लॉन्च कर रहे हैं।
RBI का नया दांव: क्यों उठा रहा है स्वैप कॉस्ट?
RBI ने यह कदम देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए उठाया है। दरअसल, हाल के दिनों में फॉरेन पोर्टफोलियो आउटफ्लो, बढ़ते जियो-पॉलिटिकल टेंशन और कच्चे तेल के महंगे होने से भारत का फॉरेक्स रिजर्व करीब $720 बिलियन से घटकर $680 बिलियन के आसपास आ गया है। RBI रुपए को स्थिर रखने के लिए डॉलर बेच रहा था। इस नई पॉलिसी के तहत, RBI बैंकों के लिए FCNR(B) डिपॉजिट्स और कुछ ECBs पर लगने वाली स्वैप कॉस्ट को झेल रहा है। इसका सीधा मतलब है कि बैंकों को इन डिपॉजिट्स पर NRIs को ज्यादा ब्याज देने में अपनी नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा। अनुमान है कि इससे $60 बिलियन से $70 बिलियन तक का फॉरेन करेंसी इनफ्लो आ सकता है।
निवेशकों के लिए क्यों है खास?
हाल के समय में बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती यह रही है कि उनका क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) डिपॉजिट ग्रोथ से काफी आगे निकल गया है। यह नई पॉलिसी बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने का एक सस्ता और कारगर तरीका दे रही है। इससे बैंक NRI इन्वेस्टर्स को ज्यादा कॉम्पिटिटिव इंटरेस्ट रेट्स (Competitive interest rates) ऑफर कर पाएंगे, जिससे उनकी अपनी कमाई पर असर नहीं पड़ेगा। यह बड़े बैंकों के लिए ख़ास तौर पर फायदेमंद है जो लोन बुक को फंड करने के लिए लगातार डिपॉजिट ग्रोथ पर निर्भर रहते हैं।
SBI समेत अन्य बैंक एक्शन में
इस पॉलिसी का फायदा उठाते हुए, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने तुरंत एक स्पेशल FCNR(B) डिपॉजिट प्रोडक्ट लॉन्च कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रोडक्ट में $100,000 के डिपॉजिट पर अतिरिक्त विदेशी कर्ज लेने की सुविधा मिल सकती है, जो पांच साल की अवधि के लिए 11.25% तक का रिटर्न दे सकता है। प्राइवेट सेक्टर के बड़े बैंक जैसे ICICI बैंक और HDFC बैंक भी NRIs से बड़ी पूंजी आकर्षित करने के लिए इसी तरह के ऑफर्स लाने की तैयारी में हैं।
आगे क्या देखना होगा?
इन्वेस्टर्स को आने वाली तिमाहियों में इन बैंकों द्वारा डिपॉजिट जुटाने की रफ्तार पर नजर रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि FCNR(B) इनफ्लो की असल मात्रा कितनी रहती है, इन डिपॉजिट्स का बैंकों के लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (Loan-to-deposit ratio) पर क्या असर पड़ता है, और क्रेडिट ग्रोथ के रुझानों में क्या बदलाव आता है। इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि ये इनफ्लो बैंकिंग सेक्टर के इंटरेस्ट मार्जिन को कैसे प्रभावित करते हैं, खासकर इन नए प्रोडक्ट्स की कॉम्पिटिटिव प्रकृति को देखते हुए।
