कैपिटल लिक्विडिटी की छुपी कीमत
सेंट्रल बैंक का यह कदम पिछले फाइनेंशियल ईयर में करीब 90% तक गिर चुकी फॉरेन करेंसी डिपॉजिट्स (Foreign Currency Deposits) की हालत सुधारने की एक आक्रामक कोशिश है। बैंकों के लिए हेजिंग कॉस्ट (Hedging Cost) को कवर करके, RBI ने वो सबसे बड़ी रुकावट हटा दी है, जिसकी वजह से बैंक पहले नॉन-रेजिडेंट इन्वेस्टर्स (Non-Resident Investors) को मार्केट-लिंक्ड यील्ड (Market-linked yields) नहीं दे पा रहे थे। इस पॉलिसी से बैंकों की फंडिंग कॉस्ट (Funding Cost) तो कम होगी, लेकिन इस दखल की जरूरत ही डोमेस्टिक लिक्विडिटी (Domestic Liquidity) में एक बड़ी कमजोरी को दिखाती है। जैसे ही बैंक इस पैसे को लाने की कोशिश करेंगे, NRI डिपॉजिटर्स को ऊंची ब्याज दरें देनी पड़ेंगी ताकि वे डोमेस्टिक मार्केट-लिंक्ड रिटर्न (Domestic market-linked returns) के बराबर रहें।
कॉम्पिटिटिव बेंचमार्किंग और लिक्विडिटी का संकट
जहां आम डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit Growth) धीमी बनी हुई है क्योंकि रिटेल पैसा इक्विटी (Equity) और म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) की तरफ जा रहा है, वहीं FCNR(B) रूट एक स्टेबल हार्ड करेंसी (Hard Currency) का जरिया है। माना जा रहा है कि इंडियन ओवरसीज बैंक (Indian Overseas Bank) जैसे पब्लिक सेक्टर बैंक (Public Sector Banks) इस विंडो का सबसे ज्यादा फायदा उठाएंगे, क्योंकि प्राइवेट सेक्टर बैंकों के मुकाबले उनकी फंडिंग कॉस्ट हमेशा से ज्यादा रही है। स्वैप फैसिलिटी एक अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन ऐसे टूल्स पर निर्भरता यह बताती है कि बैंकिंग सेक्टर के लिए क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो (Credit-Deposit Ratio) में स्ट्रक्चरल कमी एक लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। पिछले ऐसे इंटरवेंशन्स (Interventions) के डेटा बताते हैं कि भले ही डिपॉजिट वॉल्यूम (Deposit Volumes) में थोड़े समय के लिए उछाल आता है, लेकिन हिस्सा पाने के लिए मार्जिन (Spread) छोड़ने की वजह से बैंकों का कॉस्ट-टू-इंकम रेशियो (Cost-to-Income Ratio) अक्सर बिगड़ जाता है।
माइनॉरिटी का शक: मार्जिन में गिरावट और वोलेटिलिटी (Volatility)
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) को इस डेवलपमेंट पर सावधानी से गौर करना चाहिए, क्योंकि यह एक पोटेंशियल मार्जिन ट्रैप (Margin Trap) बना सकता है। जब बैंक इन स्वैप्स का इस्तेमाल डोमेस्टिक रुपए में लेंडिंग (Lending) के लिए करते हैं, तो वे तीन से पांच साल के लिए करेंसी पेयर (Currency Pair) की स्थिरता पर दांव लगा रहे होते हैं। अगर सितंबर के बाद लोकल करेंसी (Local Currency) में अप्रत्याशित वोलेटिलिटी (Volatility) आती है, या ग्लोबल इंटरेस्ट रेट एनवायरनमेंट (Global Interest Rate Environment) बदलता है, तो बैंक ऐसी लायबिलिटीज (Liabilities) में फंस सकते हैं जिन्हें सर्विस करना काफी महंगा हो जाएगा। इसके अलावा, बड़े लेंडर्स (Lenders) के मैनेजमेंट पर इस बात को लेकर जांच हो सकती है कि वे इन फंड्स को हाई-क्वालिटी, लॉन्ग-टर्म एसेट्स (High-Quality, Long-Term Assets) में कैसे लगा पाते हैं, खासकर जब क्रेडिट स्टैंडर्ड्स (Credit Standards) टाइट हो रहे हैं और कंपनियां अपना कर्ज कम कर रही हैं। इस पैसे के बैलेंस शीट पर कम यील्ड वाले लिक्विड एसेट्स (Low-Yield Liquid Assets) के तौर पर पड़े रहने का एक ठोस खतरा है, जिससे रिटर्न ऑन इक्विटी (Return on Equity) और भी कम हो सकता है।
मार्केट की चाल और रेगुलेटरी निगरानी
इस कंसेशनल फैसिलिटी (Concessional Facility) की 30 सितंबर की डेडलाइन अगले क्वार्टर में आक्रामक डिपॉजिट जुटाने की मुहिम शुरू कर देगी। एनालिस्ट्स (Analysts) की राय बंटी हुई है कि क्या यह डिपॉजिट मिक्स (Deposit Mix) में टिकाऊ बदलाव ला सकता है, या यह सिर्फ थोड़े समय की लिक्विडिटी वोलेटिलिटी (Liquidity Volatility) को मैनेज करने का एक स्टॉप-गैप मेज़र (Stop-gap measure) है। जैसे-जैसे बैंक अपने प्रोडक्ट ऑफरिंग्स (Product Offerings) को एडजस्ट करेंगे, इन फंड्स के इस्तेमाल पर रेगुलेटर्स (Regulators) की नजरें तेज हो जाएंगी, खासकर उन एसेट्स के रिस्क प्रोफाइल (Risk Profiles) पर जो इन संभावित वोलेटाइल फॉरेन करेंसी इनफ्लोज (Foreign Currency Inflows) से फाइनेंस हो रहे हैं।
