RBI की एक नई स्टडी के अनुसार, बैंक रेपो रेट में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने में काफी सुस्त हैं। जहां बैंक रेट बढ़ोतरी का **76.4%** बोझ तुरंत ग्राहकों पर डाल देते हैं, वहीं रेट कट का केवल **64%** फायदा ही ग्राहकों को मिलता है।
बैंकों की चालाकी और आपका नुकसान
RBI की रिसर्च बताती है कि बैंक ब्याज दरों के मामले में काफी 'सेलेक्टिव' होते हैं। जब रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंक अपने लोन की ब्याज दरें बिजली की रफ्तार से बढ़ा देते हैं, लेकिन जब रेपो रेट घटता है, तो वे राहत देने में आनाकानी करते हैं। इस रणनीति से बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) सुरक्षित बना रहता है और वे कठिन समय में भी अपना मुनाफा बरकरार रख लेते हैं।
बड़े कॉरपोरेट्स पर ज्यादा मार
दिलचस्प बात यह है कि इस भेदभाव का सबसे बड़ा असर बड़े औद्योगिक घरानों पर पड़ रहा है। स्टडी के मुताबिक, MSME सेक्टर को तो 122 बेसिस पॉइंट्स की राहत मिली, लेकिन बड़े कॉरपोरेट लोन की दरों में केवल 67 बेसिस पॉइंट्स की ही कमी आई। इससे साफ है कि बैंक बड़े लोन के मामले में दरों को ऊंचा बनाए रखने में ज्यादा सफल रहते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
बैंकों के लिए यह रणनीति शॉर्ट टर्म में तो फायदेमंद है, लेकिन लॉन्ग टर्म में रिस्क बढ़ा सकती है। अगर लोन की दरें बहुत लंबे समय तक महंगी बनी रहीं, तो बिजनेस नए कर्ज लेने से बचेंगे। इससे लोन ग्रोथ धीमी हो सकती है और बड़े कॉरपोरेट्स पर कर्ज का बोझ बढ़ने से बैंकों की एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर संकट मंडरा सकता है। इसलिए, बैंकिंग स्टॉक्स पर नजर रखने वाले निवेशकों को अब बैंकों की लोन बुक और पोर्टफोलियो मिक्स पर बारीकी से ध्यान देने की जरूरत है।
