Reserve Bank of India (RBI) ने अपनी रणनीति बदल दी है। अब नए बैंकिंग लाइसेंस बांटने के बजाय, रेगुलेटर मौजूदा बैंकों के एकीकरण और उनकी मजबूती पर फोकस कर रहा है। सख्त नियमों के चलते बड़ी NBFCs भी बैंक बनने से कतरा रही हैं, जिसका सीधा असर निवेशकों की रणनीति पर पड़ेगा।
RBI ने साल 1991 के बाद अपनाई गई उस नीति से दूरी बना ली है, जिसमें लगातार नए बैंकिंग लाइसेंस दिए जाते थे। अब फोकस बैंकिंग सिस्टम में बड़े बदलाव और स्थिरता लाने पर है। पहले का दौर निजी खिलाड़ियों को बैंकिंग क्षेत्र में लाकर सरकारी प्रभुत्व को चुनौती देने का था, लेकिन अब प्राथमिकता पहले से काम कर रहे बैंकों के स्वास्थ्य और उनकी पूंजी (Capitalization) को बढ़ाने की है।
निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?
निवेशकों को अब नए बैंकों के आने की उम्मीद कम कर देनी चाहिए। इसके बजाय, अब छोटे सार्वजनिक बैंकों के मर्जर पर जोर दिया जा रहा है ताकि बड़े और सक्षम बैंक बन सकें। सरकारी बैंकों का एकीकरण (Amalgamation) इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसका उद्देश्य बैलेंस शीट को मजबूत करना और जोखिम सहने की क्षमता को बढ़ाना है।
क्यों नहीं बैंक बनना चाहतीं NBFCs?
बड़ी NBFCs जैसे Bajaj Finance और Tata Capital का विस्तार आज पारंपरिक बैंकों के बराबर हो चुका है, लेकिन ये कंपनियां बैंक बनने से बच रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण 'कॉम्प्लिेंस कॉस्ट' (Compliance Cost) है। एक बैंकिंग लाइसेंस के साथ Cash Reserve Ratio (CRR) बनाए रखने और Priority Sector Lending जैसे सख्त नियम जुड़ जाते हैं, जो ऑपरेशनल लागत को भारी बना देते हैं। NBFCs के लिए मौजूदा फ्लेक्सिबल मॉडल ज्यादा मुनाफे वाला है।
मार्केट का बदलता समीकरण
बैंकिंग सेक्टर में एक और बड़ा बदलाव विदेशी बैंकों का कंज्यूमर रिटेल सेक्टर से बाहर निकलना है। कई विदेशी बैंकों ने अपने रिटेल और क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो को Axis Bank जैसे घरेलू दिग्गजों को बेच दिया है। इससे घरेलू बैंकों के पास मार्केट शेयर बढ़ाने का बड़ा मौका है।
अब निवेशकों को बैंकों की Capital Adequacy Ratio और Cost-to-Income Ratio पर बारीक नजर रखनी चाहिए। बैंकिंग सेक्टर की ग्रोथ अब इस बात पर टिकी है कि मौजूदा दिग्गज बैंक खुद को कितना डिजिटल बनाते हैं और अपनी एसेट क्वालिटी कैसे बरकरार रखते हैं।
