भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्पेशल FCNR-B डिपॉजिट स्कीम ने 17 जुलाई तक **$17.41 अरब** से ज़्यादा की रकम जुटा ली है। इस स्कीम का मक़सद 30 सितंबर की डेडलाइन से पहले नॉन-रेज़िडेंट इंडियंस (NRIs) से विदेशी मुद्रा मंगाकर रुपये को सहारा देना है।
Detailed Coverage
RBI की FCNR-B डिपॉजिट स्कीम में बंपर कलेक्शन!
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की फॉरेन करेंसी नॉन-रेज़िडेंट (FCNR-B) डिपॉजिट स्कीम को ज़बरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रोग्राम के ज़रिए अब तक $17.41 अरब से ज़्यादा की राशि जुटाई जा चुकी है। इस तेज़ी को देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि यह कलेक्शन 2013 की वैसी ही एक पहल से भी आगे निकल सकता है, जिसमें बाज़ार में उथल-पुथल के दौरान करेंसी को सहारा देने के लिए $26 अरब जुटाए गए थे।
FCNR (B) अकाउंट क्या हैं?
FCNR (B) अकाउंट्स, नॉन-रेज़िडेंट इंडियंस (NRIs) द्वारा विदेशी मुद्राओं में रखे जाने वाले फिक्स्ड डिपॉजिट होते हैं। ये डिपॉजिट इसलिए आकर्षक हैं क्योंकि ये भारत में टैक्स-फ्री होते हैं और पूरी तरह से रिपेट्रिएबल (Repatriable) होते हैं, जिसका मतलब है कि इन पैसों को निवेशक बिना किसी रोक-टोक के अपने देश वापस भेज सकते हैं। मौजूदा स्कीम की एक अहम बात यह है कि RBI बैंकों को इन विदेशी मुद्रा डिपॉजिट्स को सेंट्रल बैंक के साथ कंसेशनल रेट (Concessional Rate) पर स्वैप (Swap) करने की सुविधा दे रहा है। इससे बैंकों को करेंसी के उतार-चढ़ाव से बचाव (Hedging) की लागत कवर करने में मदद मिलती है, जिससे वे ग्लोबल कैपिटल को आकर्षित करने के लिए डॉलर डिपॉजिट पर 6% से 6.5% तक ऊंची ब्याज दरें दे पा रहे हैं।
रुपये को मज़बूती देने का मक़सद
इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (Balance of Payments) को मज़बूत करना और रुपये को सहारा देना है। भारतीय करेंसी पर दबाव देखा जा रहा है, जो इस फाइनेंशियल ईयर में 3% से ज़्यादा और FY26 में 11% तक गिर चुकी है। अर्थशास्त्रियों के मौजूदा अनुमानों के मुताबिक, आने वाले समय में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94 से 96 के बीच कारोबार कर सकता है। इन डिपॉजिट्स के ज़रिए ज़्यादा विदेशी मुद्रा मंगाकर, सेंट्रल बैंक रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करना चाहता है।
अमल में चुनौतियां और बाज़ार का नज़रिया
शुरुआती रुझान तो पॉजिटिव है, लेकिन बैंकिंग सेक्टर के जानकारों का कहना है कि अमल में कुछ ऑपरेशनल चुनौतियां हैं। कुछ बैंक इन डिपॉजिट्स पर नौ गुना तक का लीवरेज (Leverage) ऑफर कर रहे हैं, जबकि कुछ विदेशी पार्टनर्स ने इसे 19 गुना तक बढ़ा दिया है। हालांकि, भारत के बाहर ऊंचे उधार लेने की लागत (Borrowing Costs) और सख्त क्रेडिट लिमिट (Credit Limits) के कारण इन लीवरेज्ड ट्रांज़ैक्शन्स को अंजाम देना मुश्किल हो रहा है। नतीजतन, बैंक फिलहाल उन क्लाइंट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं जो बड़ी डिपॉजिट राशि दे सकते हैं। छोटे निवेशकों को शायद कम विकल्प मिलें, क्योंकि मौजूदा फंडिंग माहौल बैंकों के लिए इन डील्स पर मार्जिन कमाना मुश्किल बना रहा है।
आगे की बात करें तो, स्कीम का अगला चरण अहम होगा। ज़्यादातर इनफ्लो (Inflow) गल्फ और सिंगापुर जैसे क्षेत्रों से आने की उम्मीद है। अमेरिका और यूके जैसे क्षेत्रों से संभावित भागीदारी को लेकर कुछ सावधानी बरती जा रही है, जहां निवेशक टैक्स रिपोर्टिंग की ज़रूरतों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं। बाज़ार के प्रतिभागी 30 सितंबर की आखिरी तारीख नज़दीक आने के साथ, अगस्त और सितंबर में इनफ्लो की रफ़्तार पर नज़र रखेंगे। इस ड्राइव की अंतिम सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक NRIs के साथ अपने आउटरीच (Outreach) को कितनी प्रभावी ढंग से मैनेज करते हैं और विदेशी फंडिंग की मौजूदा लागतों से कैसे निपटते हैं।
