Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकों को विदेशी मुद्रा स्वैप (Forex swap) सौदों से पीछे हटने का इशारा दिया है। अब बैंक घरेलू तरलता (liquidity) का इस्तेमाल अमेरिकी ट्रेजरी बिलों में निवेश करने के बजाय देश के भीतर कर्ज देने में करेंगे।
बैंकों की मनमानी पर लगाम
भारतीय कमर्शियल बैंक अब तक एक लोकप्रिय फॉरेक्स ट्रेडिंग स्ट्रैटेजी का इस्तेमाल कर रहे थे, जिसे 'कैरी ट्रेड' या 'फॉरेक्स आर्बिट्रेज' कहा जाता है। इसके तहत, बैंक विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR) जमा राशि से मिली रुपये की लिक्विडिटी को डॉलर में बदलकर अमेरिकी ट्रेजरी बिलों में निवेश करते थे। इससे उन्हें अमेरिकी बॉन्ड ब्याज और फॉरवर्ड करेंसी प्रीमियम का दोहरा फायदा मिलता था।
RBI क्यों है सख्त?
RBI का साफ रुख है कि यह लिक्विडिटी भारतीय वित्तीय प्रणाली के भीतर ही रहनी चाहिए। केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि बैंकों का पैसा अंतरराष्ट्रीय डेट मार्केट में जाने के बजाय देश के औद्योगिक और खुदरा ऋण (retail credit) की जरूरतों को पूरा करे।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
यह फैसला बैंक के निवेशकों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अब तक यह ट्रेडिंग बैंकों की 'अदर इनकम' (other income) या ट्रेजरी इनकम का एक बड़ा हिस्सा हुआ करती थी। इन पोजीशन को खत्म करने से बैंकों की इस कमाई में कमी आ सकती है। इसके बाद, बैंकों पर अपने कोर बिजनेस—यानी ग्राहकों को लोन बांटने—के जरिए मुनाफा बढ़ाने का दबाव बढ़ेगा।
साथ ही, बैंकों का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) अब चर्चा का विषय बन गया है। यदि बैंक इन फंड्स को घरेलू कर्ज के रूप में सही से तैनात नहीं कर पाए, तो उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव आ सकता है। अब निवेशकों की नजरें आने वाली तिमाही नतीजों में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर रहेंगी कि इस निर्देश का असर बैंकों की कुल लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर कैसा पड़ता है।
