Reserve Bank of India ने अपनी स्पेशल फॉरेन करेंसी स्वैप फैसिलिटी को समय से एक महीने पहले यानी **31 अगस्त 2026** को बंद कर दिया है। कुल **$72.85 बिलियन** का इनफ्लो आने के बाद अब निवेशकों की नजरें बैंकिंग सेक्टर की लिक्विडिटी और बढ़ती बॉरोइंग कॉस्ट पर टिकी हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Foreign Currency Non-Resident Bank (FCNR-B) डिपॉजिट्स के लिए अपनी स्पेशल स्वैप विंडो को डेडलाइन से एक महीने पहले ही बंद कर दिया है। 21 अगस्त 2026 तक इस स्कीम के तहत कुल $72.85 बिलियन का फंड जुटाया गया।
जहां मार्केट के कई एक्सपर्ट्स को $75 बिलियन से $90 बिलियन के इनफ्लो की उम्मीद थी, वहीं अंतिम आंकड़े अनुमान के दायरे में ही रहे। इस मुहिम में HSBC India ने अहम भूमिका निभाते हुए करीब $6.14 बिलियन के डिपॉजिट्स जुटाए। बैंक मैनेजमेंट का मानना है कि यह भारत के मैक्रोइकोनॉमिक आउटलुक में ग्लोबल इन्वेस्टर्स और NRI समुदाय के भरोसे का प्रतीक है।
करेंसी और लिक्विडिटी पर असर
इस स्वैप सुविधा का मुख्य उद्देश्य फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को मजबूती देना और भारतीय रुपये (Rupee) में आ रही गिरावट को रोकना था। हालांकि, आंकड़ों से साफ है कि रिजर्व तो बढ़े, लेकिन रुपये की चाल में खास स्थिरता नहीं आई। ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और कैपिटल आउटफ्लो जैसे फैक्टर्स अभी भी रुपये पर भारी पड़ रहे हैं।
बैंकिंग सेक्टर के लिए चुनौतियां
अब बैंकिंग सेक्टर के लिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट एक नई चुनौती बनकर उभरा है। जिन बैंकों ने इस विंडो का सहारा लिया था, अब उन्हें बिना RBI की मदद के इन बड़ी लायबिलिटीज को मैनेज करना होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे फॉरेन करेंसी बॉरोइंग कॉस्ट पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि बैंकों को इन बड़े डिपॉजिट ब्लॉक्स को रिफाइनेंस करना होगा।
आने वाले महीनों में निवेशकों के लिए यह देखना सबसे जरूरी होगा कि बैंक अपनी लिक्विडिटी ट्रांजिशन को कैसे मैनेज करते हैं और फॉरेन करेंसी बॉरोइंग की बढ़ती लागत का उनके मार्जिन पर क्या असर पड़ता है।
