गवर्नेंस संबंधी चिंताओं को दूर करने की पहल
RBI का यह कदम हाल के दिनों में कुछ बैंकों, जैसे HDFC Bank, में देखी गई गवर्नेंस संबंधी समस्याओं और रेगुलेटर्स की ओर से कॉर्पोरेट गवर्नेंस को मजबूत करने के व्यापक प्रयासों के तहत उठाया गया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बोर्ड अपनी मुख्य जिम्मेदारियों पर केंद्रित रहें।
गवर्नर ने समझाया 'स्ट्रेटेजी शिफ्ट'
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि सेंट्रल बैंक का इरादा बैंकों के बोर्ड को 'स्ट्रेटेजिक स्टीवर्डशिप' यानी रणनीतिक नेतृत्व की ओर मोड़ना है, ताकि वे ऑपरेशनल डिटेल्स में उलझने के बजाय बड़े फैसलों पर ध्यान दें। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि बैंकिंग सिस्टम में कोई सिस्टमिक (systemic) जोखिम नहीं है और जो भी विशिष्ट समस्याएं आती हैं, उन्हें द्विपक्षीय (bilaterally) तौर पर संभाला जाता है। डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जानकीरमन ने भी इस बात की पुष्टि की।
इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स को मिलेगी मजबूती
इस रेगुलेटरी बदलाव के साथ ही, भारतीय वित्तीय क्षेत्र में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को बेहतर बनाने के लिए बड़े प्रयास किए जा रहे हैं। SEBI भी इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोग्राम तैयार कर रहा है। इसका लक्ष्य ऐसे डायरेक्टर्स तैयार करना है जो नवाचार (innovation) और जवाबदेही (accountability) में सक्रिय योगदान दें, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़े।
फॉरेक्स मार्केट में अस्थायी दखल
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर, RBI गवर्नर मल्होत्रा ने मार्च में फॉरेन एक्सचेंज (Forex) मार्केट में अस्थिरता (volatility) को देखते हुए किए गए अस्थायी हस्तक्षेपों (interventions) का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि यह कदम आर्बिट्रेज एक्टिविटीज से बढ़ी अस्थिरता के जवाब में उठाया गया था और जब तक मार्केट सामान्य नहीं हो जाता, तब तक ये रोक जारी रहेगी।
स्ट्रक्चरल कमियों पर भी सवाल
हालांकि, इस तरह की नीतिगत बदलावों की जरूरत इन मुद्दों की जड़ में मौजूद स्ट्रक्चरल कमियों की ओर इशारा करती है। IDFC FIRST Bank और IndusInd Bank जैसे संस्थानों में बार-बार होने वाली गवर्नेंस चुनौतियां यह बताती हैं कि रेगुलेटरी मंशा और उसके अमल में कहीं न कहीं कमी है। विश्लेषकों का मानना है कि RBI और SEBI के ये एडजस्टमेंट एक अधिक अनुशासित कॉर्पोरेट गवर्नेंस माहौल बनाने में मदद करेंगे, लेकिन यह देखना होगा कि इसका अमल कितना प्रभावी होता है।
