भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डेरिवेटिव कारोबार करने वाले बड़े बैंकों के लिए नए रिस्क नॉर्म्स जारी किए हैं। बैंकों को **1 अप्रैल 2027** तक SA-CCR (Standardised Approach for Counterparty Credit Risk) फ्रेमवर्क को अपनाना अनिवार्य होगा।
भारतीय रिजर्व बैंक ने उन बैंकों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं जिनका डेरिवेटिव पोर्टफोलियो बड़ा है या जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारतीय बैंकिंग प्रणाली को ग्लोबल Basel III मानकों के करीब लाना है। जिन बैंकों का बकाया डेरिवेटिव वॉल्यूम ₹25,000 करोड़ से अधिक है, उनके लिए यह नियम मानना अनिवार्य होगा। वहीं, छोटे बैंक फिलहाल मौजूदा Current Exposure Method को चुनने की छूट रख सकते हैं।
G-SIBs के लिए सख्ती
RBI ने भारत में काम कर रहे Global Systemically Important Banks (G-SIBs) के लिए 3.5% का न्यूनतम लेवरेज रेशियो तय किया है। रिजर्व बैंक ने बैंकों की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें बफ़र को कम करने की बात कही गई थी। इसके अलावा, अब बैंक डेरिवेटिव रिस्क कम दिखाने के लिए मिले हुए कोलैटरल (collateral) को घटाकर नहीं दिखा सकेंगे, जिससे बैंकों की कैपिटल मजबूती बढ़ेगी।
रिपोर्टिंग और निवेशकों पर असर
अब बैंकों को अपना डेटा 'सेंट्रलाइज्ड इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम' के जरिए हर तिमाही के अंत में सबमिट करना होगा। निवेशकों के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि कड़े नियमों के चलते बैंकों को अब डेरिवेटिव बुक्स के लिए अधिक कैपिटल अलग रखना होगा। इससे बैंकों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है और भविष्य में उन्हें अपनी कैपिटल स्ट्रक्चर में बदलाव करना पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय बैंकों की मजबूत स्थिति को देखते हुए इसका असर सीमित और चुनिंदा बड़े बैंकों तक ही रहने की संभावना है।
