RBI के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू ने NBFC और HFC सेक्टर के लिए 5 मुख्य पिलर्स तय किए हैं। रेगुलेटर का साफ कहना है कि तेजी से क्रेडिट बढ़ाने के चक्कर में गवर्नेंस और लेंडिंग स्टैंडर्ड्स से समझौता नहीं किया जा सकता।
मुंबई में आयोजित 7वीं CII NBFC & HFC नेशनल समिट में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने नॉन-बैंकिंग और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए फ्यूचर रोडमैप पेश किया। डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू ने जिन 5 मुख्य पिलर्स पर फोकस करने की बात कही है, उनमें गवर्नेंस और कल्चर, लिक्विडिटी मैनेजमेंट, एसेट क्वालिटी, कस्टमर प्रोटेक्शन और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन शामिल हैं।
मजबूती बनाम रफ्तार
RBI ने देखा है कि नॉन-बैंकिंग सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है, खासकर अनसिक्योर्ड रिटेल लेंडिंग में। लेकिन अब रेगुलेटर ने स्पष्ट किया है कि कंपनियों को केवल वॉल्यूम बढ़ाने पर नहीं, बल्कि अपनी संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा। बोर्ड्स को अब कंपनी की लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जाएगा।
रिस्क मैनेजमेंट और लिक्विडिटी
समिट में लिक्विडिटी मैनेजमेंट सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। RBI ने कंपनियों से कहा है कि वे बैंक कर्ज पर अपनी निर्भरता कम करें और फंडिंग के अलग-अलग सोर्स तलाशें। इसके साथ ही, छोटी अवधि के पर्सनल लोन में बढ़ती डिफॉल्ट की चिंताओं को देखते हुए, कंपनियों को अब सख्ती से स्ट्रेस टेस्टिंग करनी होगी।
सेक्टर पर क्या होगा असर?
इन नई गाइडलाइंस के बाद कंपनियों के लिए कंप्लायंस और रिस्क मैनेजमेंट केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मुख्य बिजनेस जरूरत बन गई है। भले ही इससे शॉर्ट टर्म में ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ सकती है, लेकिन इसका मकसद सेक्टर को इतना मजबूत बनाना है कि वह किसी भी आर्थिक झटके को झेल सके। निवेशकों को अब भविष्य की अर्निंग्स कॉल्स में यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी फंडिंग और रिस्क-वेटेड एसेट्स को इन 5 पिलर्स के हिसाब से कैसे मैनेज करती हैं।
