भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की खास फॉरेक्स स्वैप सुविधा के चलते बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी यानी नकदी का प्रवाह बढ़ा है। अब तक **$40.82 अरब** डॉलर का इनफ्लो आ चुका है और उम्मीद है कि सितंबर 2026 तक यह नकदी अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगी।
RBI का फॉरेक्स स्वैप गेमप्लान
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए एक खास फॉरेक्स स्वैप (Forex Swap) सुविधा शुरू की थी। इस सुविधा के तहत, 31 जुलाई 2026 तक $40.82 अरब डॉलर की रकम भारतीय बैंकिंग सिस्टम में आ चुकी है। इसमें से एक बड़ी हिस्सेदारी, यानी $36.72 अरब डॉलर, फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक), यानी FCNR(B) डिपॉजिट्स के रूप में आई है। आसान भाषा में समझें तो, यह नॉन-रेजिडेंट भारतीयों (NRI) द्वारा विदेशी करेंसी में किए गए डिपॉजिट्स हैं।
जब ये डॉलर भारत आते हैं, तो RBI बैंकों को इसके बदले में रुपये जारी करता है। इससे बैंकों के पास नकदी यानी लिक्विडिटी की उपलब्धता बढ़ जाती है। RBI का अनुमान है कि बैंकिंग सिस्टम में यह अतिरिक्त नकदी सितंबर 2026 के आसपास अपने चरम पर होगी। हालांकि, RBI ने साफ किया है कि यह मनी सप्लाई में एक स्थायी बढ़ोतरी नहीं, बल्कि एक अस्थायी स्थिति है।
बैंकिंग सिस्टम पर असर
आम निवेशक और बैंकिंग सेक्टर के लिए यह अतिरिक्त नकदी काफी अहमियत रखती है। जब बैंकों के पास ज्यादा लिक्विडिटी होती है, तो यह शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों (Short-term Interest Rates) को स्थिर रखने में मदद करती है और मनी मार्केट पर दबाव कम करती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बैंकों के पास उधार देने या सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करने के लिए ज्यादा पैसा होता है। लेकिन, इसे अनिश्चित काल के लिए आसान पैसे का संकेत नहीं समझना चाहिए। RBI इस अतिरिक्त नकदी को सावधानी से मैनेज करेगा ताकि महंगाई न बढ़े और मॉनेटरी पॉलिसी का असर बना रहे। फिलहाल, RBI की पॉलिसी रेपो रेट 5.25% पर स्थिर है, जैसा कि हालिया 5 अगस्त 2026 की समीक्षा में तय हुआ था।
क्यों घटेगी यह नकदी?
RBI इस अतिरिक्त नकदी को लंबे समय तक बनाए रखने की योजना नहीं बना रहा है। RBI के अधिकारियों का कहना है कि अर्थव्यवस्था की सामान्य जरूरतों के हिसाब से यह अतिरिक्त कैश धीरे-धीरे सोख लिया जाएगा। जैसे-जैसे सर्कुलेशन में करेंसी बढ़ेगी और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स मैच्योर होंगे, यह अतिरिक्त लिक्विडिटी स्वाभाविक रूप से कम होती जाएगी। इस तरह RBI पूरे वित्तीय सिस्टम की स्थिरता बनाए रखने पर फोकस कर रहा है।
जोखिम और ध्यान देने योग्य बातें
इस सुविधा से भारत के फॉरेक्स रिजर्व तो मजबूत हुए हैं, लेकिन इसमें कुछ जोखिम भी हैं। FCNR(B) इनफ्लो पर निर्भरता का मतलब है कि यह सिस्टम ग्लोबल ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स (US Treasury Yields) में बड़ा बदलाव आता है, तो इन डिपॉजिट्स की अपील प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, इस लिक्विडिटी के अस्थायी होने का मतलब है कि जब इनफ्लो कम होगा, तो वित्तीय सिस्टम को एडजस्ट करना होगा। निवेशकों को लिक्विडिटी मैनेजमेंट टूल्स पर RBI के आधिकारिक अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि अगर यह सरप्लस बहुत ज्यादा या लगातार बना रहता है, तो RBI वेरिएबल रेट रेपो ऑक्शन (Variable Rate Repo Auctions) जैसे उपायों का इस्तेमाल कर सकता है। FCNR(B) विंडो 30 सितंबर 2026 तक खुली है, इसलिए आने वाले महीने इस बात पर नजर रखने के लिए महत्वपूर्ण होंगे कि विंडो बंद होने से पहले सिस्टम में कितना और कैपिटल आता है।
