RBI का बड़ा फैसला: बैंकों के लिए IFR ख़त्म, कैपिटल में **25** बेसिस पॉइंट्स का उछाल संभव

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: बैंकों के लिए IFR ख़त्म, कैपिटल में **25** बेसिस पॉइंट्स का उछाल संभव
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए बड़ा ऐलान किया है। 18 मई 2026 से कमर्शियल बैंकों को इन्वेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व (IFR) रखना ज़रूरी नहीं होगा। इससे बैंकों की कैपिटल में करीब **0.25%** का इजाफा हो सकता है।

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बाजार जोखिम से निपटने का नया तरीका

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का यह फैसला, बैंकों में बाजार जोखिमों (Market Risks) से निपटने के लिए एक एकीकृत प्रणाली की ओर इशारा करता है। IFR को 2018 में तब लाया गया था जब ब्याज दरें बढ़ रही थीं और सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) पर होने वाले नुकसान से बैंकों को सुरक्षा मिल सके। इस ज़रूरत को ख़त्म करके, RBI का मानना है कि वर्तमान बेसल III (Basel III) के नियम और निवेश मूल्यांकन मानक (Investment Valuation Standards) पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसलिए, ज्यादातर बड़े बैंकों के लिए अलग से IFR बफर की ज़रूरत नहीं है।

कैपिटल में बढ़ोतरी और ज़्यादा उधारी की ताकत

17 मई 2026 से, बैंक अपने IFR बैलेंस को अन्य रिजर्व या प्रॉफिट एंड लॉस खाते में ट्रांसफर कर पाएंगे। यह फंड अब टियर-1 कैपिटल (Tier-1 Capital) का हिस्सा बनेगा, जो बैंक कैपिटल की मुख्य परत होती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बदलाव से सिस्टम-वाइड टियर-1 कैपिटल रेशियो (Tier-1 Capital Ratios) में लगभग 25 बेसिस पॉइंट्स की वृद्धि हो सकती है। हालांकि, जो बैंक पहले से ही कैपिटल की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं, उनके लिए यह एक मामूली वृद्धि है, लेकिन यह उन्हें निवेशकों से नया कैपिटल जुटाए बिना अधिक पैसा उधार देने की सुविधा देगा।

सुरक्षा जाल में कमी पर चिंताएं

कुछ विश्लेषक इस कदम को सावधानी से देख रहे हैं, उनका सुझाव है कि इससे बैंकों की कमाई में अधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। IFR के एक समर्पित बफर के रूप में न होने पर, बढ़ती ब्याज दरों के दौरान निवेश से होने वाले किसी भी नुकसान का सीधा असर बैंक के मुनाफे पर पड़ेगा। छोटे बैंक या बॉन्ड मार्केट में ज्यादा उतार-चढ़ाव का सामना करने वाले बैंक अपने वित्तीय नतीजों में बड़े बदलाव देख सकते हैं। इससे बैंक अधिक रूढ़िवादी निवेश रणनीतियाँ अपना सकते हैं या ब्याज दर जोखिम (Interest Rate Risk) के प्रति अपने एक्सपोजर को कम कर सकते हैं।

विकसित हो रहा रेगुलेटरी माहौल

RBI बैंकिंग रेगुलेशन में व्यापक बदलाव कर रहा है, जिसमें असुरक्षित लोन (Unsecured Loans) पर सख्त नियम और अपेक्षित क्रेडिट लॉस (Expected Credit Losses) का अनुमान लगाने के लिए नए फ्रेमवर्क शामिल हैं। IFR को समाप्त करना इस आधुनिक जोखिम प्रबंधन (Risk Management) के रुझान में फिट बैठता है। 2027 तक, फोकस स्थिर रिजर्व बफर से हटकर डायनामिक, जोखिम-आधारित कैपिटल आवश्यकताओं (Risk-Based Capital Requirements) पर चला जाएगा। मजबूत एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट (Asset-Liability Management) वाले बैंक, स्थिर अर्थव्यवस्था में लोन ग्रोथ को सहारा देने के लिए अपनी बढ़ी हुई कैपिटल का उपयोग करके लाभान्वित होने की उम्मीद है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.