क्यों बदलना चाहती है RBI नोट?
RBI का यह कदम सिर्फ़ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक रणनीति का हिस्सा है। वित्त वर्ष 2025 में नोट छापने का खर्च पिछले साल के मुकाबले लगभग 25% बढ़ गया है, जिससे मौजूदा कागजी नोटों का मॉडल महंगा साबित हो रहा है। भले ही UPI जैसे डिजिटल पेमेंट बढ़ रहे हैं, लेकिन असल में कैश की मांग कम नहीं हुई है। ऐसे में RBI को नकदी वाली अर्थव्यवस्था के भारी खर्चों को झेलना पड़ रहा है।
पॉलिमर नोटों का गणित
प्लास्टिक के नोटों को अपनाने का फैसला एक फायदे-नुकसान का गणित है। हालांकि, शुरू में प्लास्टिक के नोट कागज़ के नोटों से थोड़े महंगे पड़ते हैं, लेकिन 5 से 10 साल तक चलने के हिसाब से कुल लागत कम आती है। ये नोट नमी और तेल से जल्दी खराब नहीं होते, जो भारत जैसे गर्म और आर्द्र मौसम वाले देशों के लिए बहुत ज़रूरी है। खासकर ₹10 और ₹20 जैसे ज़्यादा चलने वाले नोटों के लिए, इन नोटों की छपाई की ज़रूरत 3 से 4 गुना कम हो सकती है, जिससे सरकार के सालाना खर्च में बड़ी बचत होगी।
क्या हैं चुनौतियाँ?
लंबी अवधि में बचत की संभावनाओं के बावजूद, इस प्रोजेक्ट में कई बड़ी दिक्कतें हैं। साल 2012 के पायलट प्रोजेक्ट में यह पाया गया था कि देश का मौजूदा कैश हैंडलिंग सिस्टम (जैसे ATM और नोट गिनने वाली मशीनें) कागजी नोटों के हिसाब से ही बने हैं। इन मशीनों को प्लास्टिक नोटों के हिसाब से बदलने में अरबों रुपये लगेंगे, जिसका बोझ बैंकों पर भी आ सकता है। इसके अलावा, लोगों की आदतें और उनकी पसंद भी एक मुद्दा है। कुछ देशों में प्लास्टिक जैसे चिकने नोटों को मोड़ने या पर्स में रखने में दिक्कत होती है, जिस पर लोगों ने आपत्ति जताई थी। अगर यह नया प्रोजेक्ट मौजूदा बैंकिंग सिस्टम के साथ आसानी से नहीं जुड़ पाया, तो यह पहले की तरह ही महंगा साबित होकर ठंडे बस्ते में जा सकता है।
