भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 22 साल के लंबे इंतजार के बाद शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए 'ऑन-टैप' लाइसेंसिंग प्रक्रिया फिर से शुरू कर दी है। अब इच्छुक आवेदक सख्त शर्तों के साथ लाइसेंस के लिए अप्लाई कर सकते हैं।
22 साल बाद RBI का बड़ा कदम
RBI ने साल 2004 के बाद शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए नया लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी थी। अब 22 साल बाद, केंद्रीय बैंक ने इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। इसका मकसद सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत करना और उसे अधिक पेशेवर बनाना है। RBI अब छोटे और स्थानीय सहकारी समितियों के बजाय बड़े और बेहतर तरीके से मैनेज होने वाली संस्थाओं को प्राथमिकता देगा।
लाइसेंस के लिए कड़े नियम
नई लाइसेंसिंग प्रक्रिया में शामिल होने के इच्छुक बैंकों को कड़ी शर्तों को पूरा करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है ₹300 करोड़ की न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता। इसके अलावा, नेट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) अनुपात 3% से कम होना चाहिए, जो बैंक की संपत्ति की गुणवत्ता को दर्शाता है। केवल वही संस्थाएं पात्र होंगी जो कम से कम 10 साल से परिचालन में हैं और पिछले 5 सालों से लगातार मुनाफा कमा रही हैं।
गवर्नेंस पर ज़ोर
RBI नई लाइसेंसिंग में गवर्नेंस पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। आवेदकों के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 'फिट एंड प्रॉपर' असेसमेंट की जाएगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बैंक का प्रबंधन अनुभवी लोगों के हाथों में हो। किसी भी एक सदस्य के पास 5% से अधिक शेयर नहीं होने चाहिए, ताकि शक्ति का केंद्रीकरण रोका जा सके।
बदलता बैंकिंग परिदृश्य
यह समझना ज़रूरी है कि 2004 के बाद से भारत का बैंकिंग परिदृश्य काफी बदल गया है। अब नए UCBs को स्मॉल फाइनेंस बैंक (SFBs), फिनटेक प्लेटफॉर्म और प्राइवेट बैंकों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। देश का सहकारी क्षेत्र वर्तमान में लगभग ₹7.38 लाख करोड़ की संपत्ति का प्रबंधन करता है, लेकिन उसे इस हाई-टेक और प्रतिस्पर्धी माहौल में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी होगी।
RBI का यह कदम पिछली गलतियों से सीखने का प्रयास है, क्योंकि 2004 में लाइसेंस पाने वाले कई बैंक बाद में वित्तीय रूप से कमजोर साबित हुए थे। अब देखना यह होगा कि RBI कितनी चुनिंदा एप्लीकेशंस को मंजूरी देता है और क्या यह नई लाइसेंसिंग सहकारी क्षेत्र के समेकन (consolidation) में मदद करती है या नहीं।
