RBI ने रेपो रेट बढ़ाकर **5.5%** कर दिया है। IIFL Capital के अनुमान के मुताबिक, इस कदम से बड़े बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में **10 बेसिस पॉइंट्स** तक का फायदा हो सकता है। हालांकि, बाजार में घटती लिक्विडिटी बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बढ़ा सकती है, जिस पर निवेशकों को नजर रखनी होगी।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट में बढ़ोतरी कर इसे 5.5% पर पहुंचा दिया है। इस बदलाव से बैंकिंग सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी पर गहरा असर पड़ने वाला है। रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक सेंट्रल बैंक से कर्ज लेते हैं। इसमें बढ़ोतरी होते ही बैंक अक्सर अपने लेंडिंग रेट्स बढ़ा देते हैं।\n\n### बैंकों के मार्जिन पर असर\n\nIIFL Capital के एनालिस्ट्स का मानना है कि इस रेट हाइक से बड़े बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में 6 से 10 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी हो सकती है। NIM असल में बैंक की लोन से होने वाली कमाई और डिपॉजिटर्स को दिए जाने वाले ब्याज के बीच का अंतर है। बैंकों के लोन बुक का एक बड़ा हिस्सा रेपो रेट से जुड़ा होता है, जिससे वे डिपॉजिट रेट्स के मुकाबले लेंडिंग रेट्स को जल्दी एडजस्ट कर पाते हैं।\n\nजिन बैंकों के पास फ्लोटिंग-रेट लोन का हिस्सा ज्यादा है, वे इस मुनाफे को सबसे पहले भुना सकेंगे। हालांकि, इसका फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि बैंक अपनी फंड की लागत (Cost of Funds) को कितनी कुशलता से मैनेज करते हैं।\n\n### लिक्विडिटी और बढ़ती लागत\n\nरेट हाइक के साथ ही सिस्टम में लिक्विडिटी भी कम हो रही है। आंकड़ों के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी ₹11 लाख करोड़ के पीक से गिरकर ₹5 लाख करोड़ पर आ गई है। लिक्विडिटी कम होने से मार्केट से कर्ज लेना महंगा हो रहा है। इसका सीधा असर वेटेड एवरेज कॉल रेट और तीन महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट की यील्ड पर दिखेगा।\n\nऐसे समय में जिन बैंकों के पास CASA (करंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट) का मजबूत आधार है, वे कम लागत पर फंड जुटाकर सुरक्षित रहेंगे।\n\n### निवेशकों के लिए अहम संकेत\n\nनिवेशकों को सिर्फ मार्जिन के आंकड़ों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बैंकों का लोन ग्रोथ बनाए रखना, लोन बुक की क्वालिटी और डिपॉजिट रेट्स बढ़ाने की गति भी बहुत महत्वपूर्ण है। बढ़ती ब्याज दरें लोन की मांग को सुस्त कर सकती हैं, जिससे आने वाले समय में बैंकों के एसेट क्वालिटी पर दबाव देखने को मिल सकता है।
