RBI ने Tata Sons की उस अपील को ठुकरा दिया है जिसमें उन्होंने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) का रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग की थी। इस फैसले के बाद, **$185 बिलियन** के इस विशाल समूह को अब अनिवार्य रूप से पब्लिक लिस्टिंग की ओर बढ़ना होगा।
RBI का सख्त रुख
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने Tata Sons को बड़ा झटका देते हुए उनके 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' का रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के अनुरोध को खारिज कर दिया है। केंद्रीय बैंक का यह निर्देश कंपनी के पूरे स्ट्रक्चर को बदलने वाला है। असल में, कंपनी को 'अपर लेयर' एनबीएफसी (NBFC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, क्योंकि इनकी एसेट वैल्यू ₹2.01 लाख करोड़ से अधिक है। रेगुलेटरी नियमों के तहत, इस कैटेगरी की कंपनियों को पारदर्शिता बढ़ाने के लिए स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होना जरूरी है।
गवर्नेंस और निवेशकों पर असर
Tata Sons अब तक एक प्राइवेट कंपनी के तौर पर काम करती रही है, जिसे Tata Trusts का समर्थन प्राप्त है। हालांकि, Shapoorji Pallonji Group, जिनके पास 18.4% हिस्सेदारी है, काफी समय से आईपीओ (IPO) की मांग कर रहे हैं। अब रेगुलेटरी दबाव के चलते बोर्ड को इन परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
आगे क्या होगा?
ग्रुप के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण है। चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ देंगे। ऐसे में एक प्राइवेट होल्डिंग कंपनी से पब्लिक लिस्टेड कंपनी बनने का यह सफर बोर्ड के लिए जटिल हो सकता है।
अगली बड़ी हलचल 17 सितंबर, 2026 को होने वाली बोर्ड मीटिंग में देखने को मिलेगी। मार्केट की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या कंपनी इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देगी या फिर लिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाएगी।
