RBI ने Tata Sons की Core Investment Company (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी ठुकरा दी है। इस फैसले के बाद कंपनी 'Upper Layer' NBFC नियमों के दायरे में बनी रहेगी, जिसके तहत उसे शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य हो सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 11 सितंबर, 2026 को Tata Sons के उस आवेदन को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) का दर्जा वापस करने की मांग की थी। इस फैसले ने टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी को केंद्रीय बैंक के कड़े रेगुलेटरी ढांचे में जकड़ दिया है। अब यह कंपनी सीधे तौर पर अनिवार्य पब्लिक लिस्टिंग की शर्तों के दायरे में आ गई है।
क्या है RBI का नियम?
RBI के स्केल-बेस्ड रेगुलेशन के मुताबिक, 'Upper Layer' की NBFCs, जिनका एसेट साइज काफी बड़ा है और जो सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण हैं, उन्हें शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। चूंकि Tata Sons समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है और इसके पास TCS, Tata Motors और Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए रेगुलेटर इसे एक सिस्टमैटिकली महत्वपूर्ण इकाई मानता है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और पेच
इस स्थिति ने एक रेगुलेटरी डेडलॉक पैदा कर दिया है। स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने के लिए कंपनी को 75% शेयरहोल्डर रेजोल्यूशन की आवश्यकता होगी। यदि शेयरहोल्डर इस प्रस्ताव को रोकते हैं, तो कंपनी केंद्रीय बैंक के निर्देशों का उल्लंघन कर सकती है, जिससे Tata Sons और RBI के बीच कानूनी टकराव की स्थिति बन सकती है।
यदि कंपनी लिस्टिंग के लिए मजबूर होती है, तो उसे एक साथ दो रेगुलेटर्स—RBI और SEBI—की कड़ी निगरानी में काम करना होगा। इसमें फाइनेंशियल रिपोर्टिंग से लेकर गवर्नेंस ऑडिट तक के कड़े नियम शामिल होंगे। मार्केट एक्सपर्ट्स अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या Tata Sons इस निर्देश को कोर्ट में चुनौती देगी या फिर एक जटिल IPO की प्रक्रिया शुरू करेगी।
