भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Tata Sons की उस याचिका को ठुकरा दिया है जिसमें उसने अपनी NBFC स्थिति छोड़ने की अनुमति मांगी थी। सितंबर 2025 की डेडलाइन खत्म होने के बाद अब कंपनी पर शेयर बाजार में लिस्ट होने का दबाव और बढ़ गया है।
नियम और कड़ा रुख
RBI ने साफ कर दिया है कि 'अपर लेयर' (Upper Layer) NBFC के रूप में वर्गीकृत कंपनियों के लिए रेगुलेटरी नियमों का पालन करना अनिवार्य है। सितंबर 2025 तक दी गई तीन साल की अनुपालन अवधि बीतने के बाद भी कंपनी ने लिस्टिंग नहीं की है। RBI का मानना है कि जो कंपनियां प्रणालीगत जोखिम (systemic risk) पैदा करती हैं, उन्हें पारदर्शिता के लिए सार्वजनिक होना ही होगा।
एसेट और नियम
31 मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, Tata Sons की कुल संपत्ति लगभग ₹2.01 लाख करोड़ है, जो लिस्टिंग के अनिवार्य दायरे (₹1 लाख करोड़) से काफी अधिक है। मार्च 2024 में भी रेगुलेटर ने कंपनी के 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के अनुरोध को खारिज कर दिया था।
अंदरूनी खींचतान
इस मामले में शेयरधारकों के बीच भी मतभेद खुलकर सामने आए हैं। जहां Tata Trusts कंपनी को प्राइवेट बनाए रखने के पक्ष में है, वहीं 18.37% हिस्सेदारी रखने वाला Shapoorji Pallonji Group लिस्टिंग की वकालत कर रहा है। निवेशकों के लिए लिस्टिंग एक बेहतर एग्जिट रूट और वैल्यू अनलॉक करने का जरिया हो सकती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
कंपनी ने ₹21,000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज चुकाकर अपना फाइनेंशियल बोझ कम करने की कोशिश की है, लेकिन रेगुलेटर अपनी बात पर अड़ा हुआ है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि बोर्ड का अगला कदम क्या होगा—क्या कंपनी IPO लाने की तैयारी करेगी या कोई और कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर तैयार करेगी।
