RBI का रिकॉर्ड सरप्लस: फायदे में सरकार, पर लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर उठते सवाल

BANKINGFINANCE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI का रिकॉर्ड सरप्लस: फायदे में सरकार, पर लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर उठते सवाल
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकार को रिकॉर्ड **₹2.9 लाख करोड़** का सरप्लस ट्रांसफर किया है। यह बड़ी रकम फॉरेन एक्सचेंज (Foreign Exchange) में हुए फायदों और सोने के बढ़े दामों से आई है, लेकिन यह RBI के लिक्विडिटी मैनेजमेंट (Liquidity Management) की छिपी हुई अस्थिरता को भी दर्शाती है।

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ये रिकॉर्ड सरप्लस आया कहाँ से?

RBI द्वारा खजाने में डाली गई यह भारी भरकम रकम, बैंक के कामकाज की कुशलता से ज्यादा, भारतीय रुपये में आई गिरावट और ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों में आई तेजी का नतीजा है। आय में 26% की यह बढ़ोतरी RBI द्वारा डॉलर बेचने से हुए फायदों से जुड़ी है, जिसने रुपये की अस्थिरता को कम करने में मदद की। इस तरह, RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार (USD reserves) को बेचकर जो मुनाफा कमाया, उसने सरकारी खजाने को मजबूती दी। लेकिन, यह सब तब हो रहा है जब देश में लिक्विडिटी को कंट्रोल करने की लागत बढ़ रही है और महंगाई (Inflation) को काबू में रखने के लिए सख्त मौद्रिक नीति (Monetary Policy) की जरूरत है।

RBI की बैलेंस शीट और संपत्ति का गणित

आम बैंकों के विपरीत, RBI की बैलेंस शीट ₹92 लाख करोड़ तक पहुंच गई है, जिसमें ज्यादा रिटर्न देने वाली लेकिन जोखिम भरी संपत्तियों का हिस्सा बढ़ा है। सोने (Gold) की होल्डिंग में 63.8% की बढ़ोतरी मुख्य रूप से ग्लोबल मार्केट में आई तेजी के कारण है, न कि RBI द्वारा सक्रिय रूप से सोना खरीदने की रणनीति के कारण। रीवैल्यूएशन अकाउंट्स (Revaluation Accounts) पर यह भारी निर्भरता, जो अब ₹21.7 लाख करोड़ हो गई है, RBI को 'पेपर गेन' की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है। अगर सोने की ग्लोबल कीमतें गिरती हैं या रुपया डॉलर के मुकाबले स्थिर हो जाता है, तो भविष्य में RBI की आय में भारी कमी आ सकती है, जिससे सरकार के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) को सपोर्ट करने की उसकी क्षमता सीमित हो सकती है।

सरकारी कर्ज और RBI की भूमिका का जोखिम

RBI की मौजूदा वित्तीय स्थिति में कुछ संरचनात्मक जोखिम भी हैं। घरेलू सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) में 45% से ज्यादा की बढ़ोतरी करके, RBI सरकारी कर्ज के प्रबंधन में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। इससे एक ऐसा चक्र बनता है जहाँ RBI की लिक्विडिटी ऑपरेशंस (Liquidity Operations) सरकार के उधारी कार्यक्रम से और अधिक जुड़ जाते हैं। आलोचकों का कहना है कि इससे मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, और RBI अप्रत्यक्ष रूप से फिस्कल डेफिसिट को मैनेज करने का काम कर रहा है। इसके अलावा, हाई-यील्ड वाले अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) पर निर्भरता, फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की नीतियों में बदलाव के प्रति पोर्टफोलियो को जोखिम में डालती है; अगर ब्याज दरों में कटौती का कोई भी अप्रत्याशित कदम उठाया जाता है, तो नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) में तुरंत कमी आ सकती है, जिसने इस साल आय को बढ़ाया था।

आगे की रणनीति और बाजार की चिंता

अब बाजार यह देख रहा है कि क्या RBI के इस सरप्लस ट्रांसफर से सरकार को बाजार से उधार कम करने में मदद मिलेगी, जो बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) के लिए अच्छा होगा। हालांकि, अचानक लिक्विडिटी इंजेक्ट करने से महंगाई बढ़ने का खतरा संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) के लिए एक बड़ी चिंता बना हुआ है। भविष्य में, यह ध्यान दिया जाएगा कि फॉरेन एक्सचेंज से होने वाली कमाई कितनी टिकाऊ है, क्योंकि RBI स्थिर रुपये और आयातित महंगाई (Imported Inflation) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर रीवैल्यूएशन से फायदा जारी नहीं रहता है, तो RBI के लिए इन कमाईयों को दोहराना मुश्किल हो सकता है, जिसके लिए अगले साल एक अधिक सतर्क फिस्कल अप्रोच (Fiscal Approach) की आवश्यकता होगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.