RBI की मेहरबानी! नए लोन हुए सस्ते, FY26 में ब्याज दरों में आई बड़ी गिरावट

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI की मेहरबानी! नए लोन हुए सस्ते, FY26 में ब्याज दरों में आई बड़ी गिरावट

RBI के फैसलों और एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) सिस्टम के चलते नए लोनों की ब्याज दरों में तेजी से गिरावट आई है। CareEdge Ratings की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026 में, शिक्षा, MSME और हाउसिंग जैसे सेक्टर्स में कर्ज लेना पहले से काफी सस्ता हो गया है।

Detailed Coverage

EBLR सिस्टम का कमाल: ब्याज दरों में तुरंत मिली राहत

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से बेंचमार्क दरों में कटौती और मॉनेटरी पॉलिसी को नरम बनाए रखने के फैसले का असर अब नए लोनों की ब्याज दरों पर दिखने लगा है। CareEdge Ratings की एक नई रिपोर्ट बताती है कि नए कर्ज लेने वालों को इन बदलावों का फायदा पुरानी लोनগুলোর मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से मिल रहा है।

इसकी सबसे बड़ी वजह एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) सिस्टम का व्यापक इस्तेमाल है। EBLR, रिटेल और बिजनेस लोनों को सीधे RBI की रेपो रेट जैसे बाहरी बेंचमार्क से जोड़ता है। जब सेंट्रल बैंक अपनी प्रमुख दरें घटाता है, तो EBLR सिस्टम ब्याज दरों को तुरंत एडजस्ट करने पर मजबूर करता है। इससे बैंकों ने नई ग्राहकों को कम ब्याज दरों का लाभ पिछली बार की तुलना में तेजी से दिया है।

शिक्षा और MSME लोन सबसे ज्यादा हुए सस्ते

ब्याज दरों में यह कटौती सभी सेक्टर्स में एक जैसी नहीं है। सबसे ज्यादा राहत नए एजुकेशन लोनों में देखने को मिली, जहां ब्याज दरें 127 बेसिस पॉइंट तक गिरीं। छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और व्यापार से जुड़े कर्जदारों को भी बड़ी राहत मिली, जहां दरें क्रमशः 97 बेसिस पॉइंट और 94 बेसिस पॉइंट कम हुईं। रिटेल क्रेडिट के अहम हिस्से, हाउसिंग सेक्टर के लिए नए लोन की दरों में 92 बेसिस पॉइंट की कमी आई। यह दिखाता है कि बैंक किफायती शर्तों की पेशकश करके हाई-क्वालिटी वाले कर्जदारों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।

पुराने लोन और आगे की राह

हालांकि नए लोनों की दरें तेजी से बदली हैं, लेकिन पुराने, यानी मौजूदा लोनों की री-प्राइजिंग एक धीमी प्रक्रिया बनी हुई है। पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स में अक्सर फिक्स्ड रिव्यू पीरियड या स्पेसिफिक रीसेट क्लॉज होते हैं, जो तुरंत बदलाव को रोकते हैं। उदाहरण के लिए, मौजूदा ट्रेड लोनों में 100 बेसिस पॉइंट की कमी आई, जबकि हाउसिंग लोन 99 बेसिस पॉइंट घटे। बड़े उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर लोन जैसे अन्य सेगमेंट में 85 से 91 बेसिस पॉइंट तक की मामूली गिरावट देखी गई।

निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बैंकिंग सिस्टम में यह अतिरिक्त लिक्विडिटी (तरलता) कब तक बनी रहती है और क्या कर्ज की मांग बढ़ती रहेगी। कम दरें जहां कर्जदारों की मदद कर रही हैं और क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट कर रही हैं, वहीं वे बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) को भी प्रभावित कर सकती हैं। अगर बैंक अपनी डिपॉजिट की दरों को एडजस्ट करने से पहले लोनों को री-प्राइस करते रहे, तो आने वाली तिमाहियों में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। निवेशक व्यक्तिगत बैंकों के लिए आगामी तिमाही नतीजों पर नजर रख सकते हैं कि वे इन कम लेंडिंग दरों को फंड की लागत के साथ कैसे संतुलित करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.