RBI अलर्ट! बैंकों से कहा - 'जमाएं बढ़ाओ', इक्विटी में जा रहे पैसों से मंडराया खतरा

BANKINGFINANCE
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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI अलर्ट! बैंकों से कहा - 'जमाएं बढ़ाओ', इक्विटी में जा रहे पैसों से मंडराया खतरा
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बैंकों से बात कर रहा है कि वे कैसे ज़्यादा स्थिर जमाएं (Deposits) जुटा सकें। दरअसल, लोग अपने बैंक खातों से पैसा निकालकर इक्विटी और दूसरे निवेशों में लगा रहे हैं, जिससे लोन (Loan) की ग्रोथ जमाओं की ग्रोथ से तेज़ हो गई है। इस वजह से बैंकों को महंगा उधार लेना पड़ रहा है, जिससे उनका मुनाफा घट रहा है और लोन देने की रफ्तार भी धीमी हो सकती है। RBI और बैंक अब इस स्थिति से निपटने के लिए नए नियम और प्रोडक्ट लाने पर विचार कर रहे हैं।

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RBI का बड़ा निर्देश: जमाओं (Deposits) पर हो फोकस!

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों को जमाओं (Deposits) को बढ़ाने और उन्हें स्थिर रखने के लिए सक्रिय कदम उठाने को कहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब लोग अपने पैसे को बैंक खातों से निकालकर इक्विटी और अन्य निवेशों में लगा रहे हैं, जिससे बैंकों के लिए फंड की कमी और लागत बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

लोन की ग्रोथ तेज़, जमाओं की धीमी: बैंकों की मुश्किल बढ़ी

यह स्थिति तब और गंभीर हो गई है जब भारत के बैंकों में लोन बांटने की रफ्तार और जमाएं जमा होने की रफ्तार के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। मिड-मार्च 2026 तक, कुल लोन सालाना 13.8% बढ़े थे, जबकि जमाओं में सिर्फ 10.8% की बढ़ोतरी हुई। इस बड़े अंतर ने क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो (लोन और जमाओं का अनुपात) को रिकॉर्ड 83% तक पहुंचा दिया है। इस कमी को पूरा करने के लिए, बैंक छोटी अवधि के बाज़ारों से, खासकर सर्टिफिकेट्स ऑफ डिपॉजिट (CDs) के ज़रिए, ज़्यादा उधार ले रहे हैं। इन CDs की लागत काफी बढ़ गई है, जो मिड-2025 में करीब 6% थी, वहीं अब यह 7.1% के आसपास पहुँच गई है। इसका मतलब है कि बैंकों को उधार लिए गए पैसों के लिए ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। वहीं, कम लागत वाली करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट (CASA) जमाओं का हिस्सा FY22 में 44.8% से घटकर दिसंबर 2025 तक 37.9% रह गया है।

बचत का बदलता मिजाज: इक्विटी की ओर बढ़ते कदम

यह स्थिति भारतीय परिवारों के पैसे संभालने के तरीके में एक बड़े, लंबे समय से चल रहे बदलाव को दिखाती है। सालों से, लोग बेहतर रिटर्न की उम्मीद में बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट से पैसा निकालकर इक्विटी और म्यूचुअल फंड की ओर ले जा रहे हैं। भले ही मार्च 2026 में म्यूचुअल फंड में अच्छी रक़म आई, इक्विटी फंडों ने बड़ा पैसा आकर्षित किया और सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) नई ऊंचाई पर पहुंचे, यह दिखाता है कि बचत करने वाले अपनी प्राथमिकताओं को मौलिक रूप से बदल रहे हैं। मध्य पूर्व संघर्ष जैसी वैश्विक घटनाओं ने भारत में उपलब्ध नकदी को भी कम कर दिया है और हाल ही में छोटी अवधि की ब्याज दरों को 0.5% से 0.7% तक बढ़ा दिया है। सिर्फ मार्च 2026 में, $12.5 बिलियन कैपिटल मार्केट से बाहर चले गए, जिससे बैंकों पर फंड की कमी का दबाव और बढ़ गया। रुपये को सहारा देने के लिए RBI की कार्रवाइयों ने भी वित्तीय प्रणाली में लिक्विडिटी (तरलता) जोड़ने की उसकी क्षमता को सीमित कर दिया है, जिससे मार्च 2026 में नकदी की कमी और बढ़ गई।

जानकारों की चिंता: मार्जिन पर दबाव और फंड का खतरा

विशेषज्ञों का अनुमान है कि लोन और जमाओं की ग्रोथ के बीच यह लगातार बढ़ता अंतर बैंकों के लिए फंड की कमी और बढ़ी लागत का सबब बन सकता है। नोमुरा का अनुमान है कि FY27 में बैंकों के प्रॉफिट मार्जिन (Net Interest Margins - NIMs) सिकुड़ सकते हैं, क्योंकि लोन की ग्रोथ अभी भी जमाओं से आगे निकल रही है, और वे इस बदलाव को लंबी अवधि का मान रहे हैं। फिच रेटिंग्स का अनुमान है कि FY27 में भारतीय बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) – यानी कमाए गए ब्याज और चुकाए गए ब्याज के बीच का अंतर – पैसे की तंग सप्लाई और महंगी फंडिंग के कारण 0.2% से 0.3% तक गिर सकते हैं। बढ़ी हुई फंडिंग की लागत, कम लागत वाली CASA जमाओं के कम होने के साथ मिलकर, बैंकों के लिए मुनाफा कमाना और मुश्किल बना रही है। RBI की रुपये को स्थिर करने की ज़रूरत का मतलब यह भी है कि उसके पास सिस्टम में नकदी डालने के लिए कम गुंजाइश है, जिससे ये जोखिम बढ़ रहे हैं। हालांकि 2025 में भारतीय शेयर बाज़ारों ने ग्लोबल बाज़ारों जैसा प्रदर्शन नहीं किया, म्यूचुअल फंड में हालिया मजबूत इनफ्लो निवेशकों की लगातार रुचि को दर्शाता है। हालांकि, बैंकों की लोन देने की क्षमता इन मुख्य फंडिंग मुद्दों को सुलझाने पर निर्भर करती है।

आगे क्या? RBI और बैंक खोज रहे समाधान

RBI बैंकों से संभवित नए नियम और प्रोडक्ट्स पर चर्चा कर रहा है ताकि बड़ी और ज़्यादा स्थिर जमाओं को आकर्षित किया जा सके। इन आइडियाज़ में अलग-अलग तरह के ग्राहकों के लिए अलग-अलग ब्याज दरें देना और नोटिस अकाउंट या बाज़ार की शर्तों से जुड़ी ब्याज दरों वाले डिपॉजिट जैसे नए विकल्प तलाशना शामिल है। बैंकों को अब स्थिर और सस्ती फंडिंग लाने के लिए अपनी रणनीतियों को बदलना होगा। यह उनके लिए लोन देना जारी रखने और बढ़ती लागतों व बदलती ग्राहक की बचत की आदतों के माहौल में मुनाफे का प्रबंधन करने के लिए महत्वपूर्ण है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.