RBI का MSME को सहारा देने का नया प्लान
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने BB-रेटेड लोन पर बैंकों द्वारा रखी जाने वाली जोखिम पूंजी को 150% से घटाकर 100% करने का प्रस्ताव दिया है। इसका सीधा मकसद बैंकों के लिए इन कर्ज़ों को और आकर्षक बनाना और MSME (Micro, Small and Medium Enterprises) जैसे ज़रूरी सेक्टर को ज़्यादा से ज़्यादा क्रेडिट (credit) मुहैया कराना है। भारत की इकॉनमी में MSME सेक्टर का योगदान करीब 30% GDP और 11 करोड़ से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देता है। लेकिन, इस सेक्टर को करीब ₹20-25 लाख करोड़ के क्रेडिट गैप (credit gap) का सामना करना पड़ता है, जबकि उन्हें मिलने वाला औपचारिक लोन (formal credit) ग्लोबल एवरेज (global average) से काफी कम, सिर्फ़ 14% तक ही सीमित है। कम पूंजी की ज़रूरत से बैंकों के लिए इन ज़रूरी बिज़नेस को फाइनेंस करना आसान होगा, जिससे रोज़गार और निर्यात (export) को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, यह कदम वित्तीय स्थिरता (financial stability) के साथ क्रेडिट फ्लो को संतुलित करने में कितना कामयाब होगा, यह कड़ी निगरानी (oversight) पर निर्भर करेगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर इम्पोर्टेड टेक का खतरा
इसी बीच, राष्ट्रीय सुरक्षा (national security) को लेकर एक चिंताजनक अलर्ट सामने आया है। कुछ इम्पोर्टेड CCTV सिस्टम में ऐसी ख़ामियां पाई गई हैं, जिनसे अनधिकृत लोग भारतीय वीडियो फीड तक पहुँच बना सकते हैं। यह विदेशी तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता के खतरों को उजागर करता है। साल 2025 में ही भारत पर 2.65 करोड़ से ज़्यादा साइबर हमले (cyberattacks) हुए, जिनमें से कई सीधे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर (critical infrastructure) को निशाना बना रहे थे। ऐसी निगरानी तकनीक (surveillance tech) के इस्तेमाल से जासूसी (spying) और राष्ट्रीय संप्रभुता (national sovereignty) को खतरा हो सकता है। इन चिंताओं के चलते, अब सुरक्षित और घरेलू तकनीक (domestic technology) पर ज़ोर दिया जा रहा है, जिसमें खास तौर पर सरकारी और महत्वपूर्ण साइट्स के लिए निगरानी उपकरणों का कड़ा परीक्षण (testing) और सर्टिफिकेशन (certification) शामिल है।
SBI के विस्तार पर गवर्नेंस की बड़ी चुनौती
दूसरी ओर, देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) अपने बैलेंस शीट (balance sheet) को 2030 तक भारत के GDP के 25% तक बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना बना रहा है। इस बड़े लक्ष्य के साथ, उसके विस्तार की गुणवत्ता और स्थिरता पर भी कड़ी नज़र रखी जा रही है। SBI का बाज़ार मूल्य (market value) करीब ₹10.27 लाख करोड़ है और ROE (Return on Equity) 17.2% है। लेकिन, इसके विस्तार के लिए गवर्नेंस (governance) और रिस्क मैनेजमेंट (risk management) का भी तेज़ी से बढ़ना ज़रूरी है। करीब 52 करोड़ से ज़्यादा ग्राहकों को सेवा देने वाला यह बैंक, जब 800 ज़िलों में अपना विस्तार कर रहा है, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह वृद्धि वाकई वित्तीय समावेशन (financial inclusion) और दक्षता (efficiency) में सुधार करेगी, या सिर्फ़ जमा और लोन बढ़ाएगी।
मुख्य जोखिम और आगे का रास्ता
कुल मिलाकर, RBI के MSME लोन बढ़ाने के प्रस्ताव में जोखिम (risk) है। ज़्यादा मुनाफ़े के चक्कर में बैंक कड़ाई से जांच किए बिना BB-रेटेड उधारकर्ताओं पर दांव लगा सकते हैं, जिससे आगे चलकर लोन की क्वालिटी बिगड़ सकती है। MSME की क्रेडिट-वर्थिनेस (creditworthiness) का आकलन करना मुश्किल है, और FY16-FY18 के NPA (Non-Performing Assets) का इतिहास सतर्कता की ज़रूरत बताता है। साइबर सुरक्षा (cybersecurity) के खतरे भी बने हुए हैं, खासकर स्टेट-स्पॉन्सर्ड (state-sponsored) हमलों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का। SBI की विशाल विस्तार योजनाएं गवर्नेंस के लिए बड़ी चुनौती पेश करती हैं; तेज़ी से बढ़ता आकार अक्सर आंतरिक नियंत्रणों (internal controls) को भारी कर देता है। भविष्य में, RBI के प्रस्ताव की सफलता कड़ी निगरानी और बैंकों की सावधानीपूर्ण जोखिम मूल्यांकन (risk assessment) पर टिकी होगी। वहीं, SBI की तरक्की सिर्फ़ उसके आकार पर नहीं, बल्कि मज़बूत गवर्नेंस, सुदृढ़ रिस्क मैनेजमेंट और वास्तविक वित्तीय समावेशन को संतुलित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
