RBI का मास्टरस्ट्रोक! MSME को अब मिलेगा तुरंत भुगतान, TReDS प्लेटफॉर्म में होंगे बड़े सुधार

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI का मास्टरस्ट्रोक! MSME को अब मिलेगा तुरंत भुगतान, TReDS प्लेटफॉर्म में होंगे बड़े सुधार
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने छोटे और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) के लिए एक बड़ी राहत का ऐलान किया है। RBI, ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) में महत्वपूर्ण सुधार करने जा रहा है, जिसका मकसद MSMEs के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को आसान बनाना और उन्हें समय पर भुगतान दिलाना है। इसके साथ ही, लेंडर्स (lenders) के लिए जोखिम कम करने हेतु एक गारंटी कवर (guarantee cover) का प्रावधान भी लाया जा रहा है, जिससे छोटे व्यवसायों को फाइनेंस (finance) मिलना आसान हो जाएगा।

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RBI का बड़ा कदम: MSME सेक्टर में आएगा पैसों का फ्लो

RBI ने TReDS प्लेटफॉर्म को और बेहतर बनाने के लिए नई गाइडलाइन्स का ड्राफ्ट जारी किया है। यह एक दशक पुराना प्लेटफॉर्म है जो इनवॉइस डिस्काउंटिंग (invoice discounting) के लिए इस्तेमाल होता है। इन सुधारों से MSME सेक्टर को काफी फायदा पहुंचने की उम्मीद है।

ऑनबोर्डिंग होगी आसान, जोखिम होगा कम

प्रस्तावों के तहत, MSMEs के लिए TReDS प्लेटफॉर्म पर आना-जाना (onboarding) अब बहुत आसान हो जाएगा। बैंकों और NBFCs जैसे फाइनेंसर्स के लिए, MSMEs को दिए जाने वाले फाइनेंस पर गारंटी कवर मिलेगा। यह जोखिम कम करेगा और उन्हें इस सेक्टर में पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। नए प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स के लिए भी एंट्री बैरियर (entry barrier) कम किया गया है; अब न्यूनतम नेट वर्थ (net worth) ₹25 करोड़ चाहिए, जो पहले ₹100 करोड़ के पेड-अप कैपिटल (paid-up capital) से काफी कम है। पारदर्शिता (transparency) और धोखाधड़ी (fraud) रोकने के लिए, TReDS प्लेटफॉर्म को रिसीवेबल्स (receivables) के असाइनमेंट (assignment) की जानकारी CERSAI (सेंट्रल रजिस्ट्री ऑफ सिक्योरिटाइजेशन एसेट रिकंस्ट्रक्शन एंड सिक्योरिटी इंटरेस्ट ऑफ इंडिया) के पास भी दर्ज करानी होगी।

₹8.1 लाख करोड़ की पेमेंट समस्या का समाधान

भारत के लिए MSMEs अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन समस्या यह है कि लगभग ₹8.1 लाख करोड़ रुपया देर से हो रहे भुगतानों में फंसा पड़ा है। यह फंसा हुआ पैसा MSMEs के वर्किंग कैपिटल (working capital) को गंभीर रूप से प्रभावित करता है और उनकी ग्रोथ (growth) को रोकता है। अक्सर, खरीदारों के साथ खराब रिश्ते या आगे के ऑर्डर खोने के डर से MSMEs कानूनी कार्रवाई से बचते हैं।

गारंटी से बढ़ेंगे MSME फाइनेंस और सप्लाई चेन

Receivables Exchange of India के MD और CEO, केतन गायकवाड़ ने बताया कि खरीदार-आधारित जोखिम मॉडल (buyer-risk model) बना रहेगा, जो क्रेडिट डिसिप्लिन (credit discipline) सुनिश्चित करता है। FY27 के बजट में खरीदारों के लिए टर्नओवर (turnover) की सीमा ₹250 करोड़ की गई है, जिससे यह प्लेटफॉर्म और ज्यादा खरीदारों के लिए खुल जाएगा। क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर MSMEs (CGTMSE) का उपयोग MSME एक्सपोज़र (exposure) के लिए फाइनेंसर्स को और मजबूती देगा, जिससे वे कम रेटिंग वाले कॉर्पोरेट्स (corporates) को भी सपोर्ट कर पाएंगे। M1xchange के संस्थापक, सुदीप मोहिंद्र ने इस बात पर जोर दिया कि TReDS में डिफॉल्ट रेट (default rate) ऐतिहासिक रूप से बहुत कम (0.3%) रहा है, जिसका मुख्य कारण खरीदार-केंद्रित जोखिम है। यह गारंटी लेंडर्स की कैपिटल एफिशिएंसी (capital efficiency) को बेहतर बनाएगी और सप्लाई चेन (supply chain) में गहरे तक फाइनेंसिंग पहुंचाएगी, जिससे छोटे वेंडर्स (vendors) को भी सहारा मिलेगा।

एक्सपोर्टर्स को भी मिलेगा सहारा

बदलते वैश्विक व्यापार (global trade) माहौल में MSME एक्सपोर्टर्स (exporters) के लिए समय पर भुगतान बेहद जरूरी है। Drip Capital के CEO, पुष्कर मुकेवर ने कहा कि जो एक्सपोर्टर्स तेज और लचीले ट्रेड फाइनेंस (trade finance) का लाभ उठा पाते हैं, वे सफल हो रहे हैं, जबकि दूसरे पारंपरिक बैंकिंग (traditional banking) की देरी से परेशान हैं। उन्होंने कहा कि समय-संवेदनशील शिपमेंट (shipment) की मांग पर कार्रवाई करने के लिए पूंजी (capital) तक पहुंचना महत्वपूर्ण है।

कानूनी वर्गीकरण से कुछ फाइनेंसर्स को दिक्कत

हालांकि, UGRO Capital के शशिंद्र नाथ ने एक समस्या की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि TReDS आर्थिक रूप से एक शॉर्ट-टर्म क्रेडिट एक्सपोज़र (short-term credit exposure) है, लेकिन कानूनी तौर पर इसे रिसीवेबल्स असाइनमेंट (receivables assignment) के कारण फैक्टरिंग (factoring) माना जाता है। इस वर्गीकरण से कुछ NBFCs को दिक्कतें आती हैं, जिससे फाइनेंसर्स की संख्या सीमित होती है और MSMEs के लिए कर्ज की कीमत (pricing) प्रभावित होती है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.