फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में RBI की नई राह
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में एक अहम बदलाव ला रहा है। RBI ने ड्राफ्ट नियमों का प्रस्ताव रखा है, जिससे ऑथराइज्ड डीलर्स (ADs) - जिनमें कमर्शियल बैंक और प्राइमरी डीलर्स शामिल हैं - भारत के बाहर स्थित इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स (ETPs) पर फॉरेन एक्सचेंज और करेंसी इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव्स के सौदे कर सकेंगे। इस कदम का मकसद ग्लोबल मार्केट की लिक्विडिटी (liquidity) और एडवांस्ड ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाना है, ताकि घरेलू डेरिवेटिव मार्केट को और गहरा और कुशल बनाया जा सके। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल फॉरेन एक्सचेंज मार्केट का रोज़ाना का टर्नओवर (turnover) करीब $9.6 ट्रिलियन है, और इसमें ETPs का बड़ा योगदान है।
ग्लोबल स्टैंडर्ड्स और ऑफशोर ऑपरेशंस
इस रेगुलेटरी विस्तार के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों का सख्ती से पालन करना ज़रूरी होगा। जिन विदेशी ETPs पर ये सौदे होंगे, वे उन देशों में रजिस्टर्ड होने चाहिए जो फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) के सदस्य हों। साथ ही, इन प्लेटफॉर्म्स को पेमेंट एंड मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर्स (CPMI) या इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ सिक्योरिटीज कमीशन्स (IOSCO) से जुड़ी रेग्युलेटरी अथॉरिटीज द्वारा रेगुलेट किया जाना चाहिए। जब भारतीय रुपये (INR) से जुड़े सौदे होंगे, तो एक अहम नियम यह है कि ADs केवल नॉन-रेजिडेंट्स (Non-Residents) के साथ ही ट्रेड कर पाएंगे। इसके अलावा, विदेशी ETP ऑपरेटर को ट्रांजैक्शन डेटा (transaction data) सार्वजनिक रूप से जारी करना होगा। यह पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा और रेगुलेटरी आर्बिट्रेज (regulatory arbitrage) को कम करने में मदद करेगा।
रुपया डेरिवेटिव्स और गवर्नेंस फ्रेमवर्क
प्रस्तावित नियमों के तहत, ऑथराइज्ड डीलर कैटेगरी-I (AD-I) बैंक, अन्य ADs और विदेशी एंटिटीज़ (entities) के साथ, जिसमें इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर (IFSC) बैंकिंग यूनिट्स भी शामिल हैं, रुपये से जुड़े नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (NDDCs) कर सकेंगे। इन कॉन्ट्रैक्ट्स का सेटलमेंट रुपये या विदेशी करेंसी में कैश में किया जा सकता है, बशर्ते बैंक या उसकी नॉन-रेजिडेंट पैरेंट कंपनी के पास IFSC बैंकिंग यूनिट हो। यह प्रावधान इसलिए भी अहम है क्योंकि ऑफशोर INR-NDF मार्केट्स बढ़ रहे हैं, जो उन एंटिटीज़ के लिए हेजिंग (hedging) के रास्ते खोलते हैं जिन्हें ऑनशोर हेजिंग की इजाजत नहीं है। RBI गवर्नेंस ज़रूरतों को भी मज़बूत कर रहा है। ADs को फॉरेन एक्सचेंज डीलिंग के लिए बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी (Board-approved policy) बनानी होगी। एक ज़रूरी नियम नेट ओवरनाइट ओपन पोजीशन (NOOP) लिमिट का है, जो कुल कैपिटल (Tier I और Tier II) के 25% पर सीमित होगी।
उदारीकरण में जोखिम
हालांकि RBI का यह कदम बाज़ार के विकास और ग्लोबल इंटीग्रेशन के लिए उठाया गया है, लेकिन इसमें कुछ जोखिम भी हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। ऑफशोर ETPs पर निर्भरता, भले ही वे FATF, CPMI और IOSCO द्वारा रेगुलेटेड हों, ओवरसाइट (oversight) और एनफोर्समेंट (enforcement) में जटिलताएँ ला सकती है। रेगुलेटरी आर्बिट्रेज का खतरा बना रह सकता है, क्योंकि एंटिटीज़ विभिन्न रेगुलेशंस के बीच के अंतर का फायदा उठाने की कोशिश कर सकती हैं। नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (NDDCs) की प्रकृति, जो फिजिकल करेंसी की डिलीवरी के बिना कैश-सेटल होते हैं, सट्टेबाजी (speculative activities) को बढ़ावा दे सकती हैं और अगर ठीक से मैनेज न किया जाए तो रुपये की कीमत में अस्थिरता (volatility) ला सकती है। कुल कैपिटल के 25% तक की NOOP लिमिट, प्रूडेंशियल (prudential) होने के बावजूद, बड़े लेवरेज्ड एक्सपोजर (leveraged exposure) की अनुमति दे सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल FX मार्केट में एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग (algorithmic trading) का बढ़ता इस्तेमाल, जो एफिशिएंसी (efficiency) बढ़ाता है, तनाव के दौरान अचानक लिक्विडिटी में बदलाव या अस्थिरता को कई गुना बढ़ा सकता है। ETP ऑपरेटर्स की निगरानी और डेटा डिस्सेमिनेशन (data dissemination) नियमों का पालन मार्केट मैनिपुलेशन (market manipulation) को रोकने और वित्तीय अखंडता (financial integrity) बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
भविष्य का नज़रिया: मार्केट का विस्तार और बेहतर निगरानी
RBI का यह प्रस्ताव भारतीय फॉरेन एक्सचेंज मार्केट को और मज़बूत और वैश्विक स्तर पर अधिक कनेक्टेड बनाने की दिशा में एक सोची-समझी कोशिश है। रेगुलेटेड ऑफशोर ETPs पर भागीदारी की अनुमति देकर, RBI का लक्ष्य लिक्विडिटी बढ़ाना, भारतीय एंटिटीज़ के लिए हेजिंग ऑपरेशन्स को सुव्यवस्थित करना और डेरिवेटिव मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर को गहरा करना है। FATF, CPMI और IOSCO जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन, बाज़ार की अखंडता बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस पहल की सफलता, इन ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स के प्रभावी कार्यान्वयन (implementation) और निरंतर निगरानी (supervision) पर निर्भर करेगी, ताकि बाज़ार विकास की यह दौड़ वित्तीय स्थिरता से समझौता न करे। जैसे-जैसे भारत अपनी आर्थिक उदारीकरण की राह पर आगे बढ़ रहा है, ऐसे कदम वैश्विक वित्तीय आर्किटेक्चर में इसकी बढ़ती भूमिका का संकेत देते हैं।