RBI की लिक्विडिटी इक्वेशन: CRR पर मंथन
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को सीधे तौर पर मैनेज करने के लिए Cash Reserve Ratio (CRR) के इस्तेमाल पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब लिक्विडिटी की स्थिति में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और एडवांस टैक्स पेमेंट्स जैसी भविष्य की मांगें भी सामने आ रही हैं। 6 फरवरी, 2026 को हुई मॉनेटरी पॉलिसी अनाउंसमेंट में RBI ने अपने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा था और न्यूट्रल पॉलिसी स्टैंड बनाए रखा, जिसका मतलब है कि लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर फोकस जारी रहेगा [6, 9, 19, 24]। फिलहाल सिस्टम लिक्विडिटी में औसतन लगभग ₹75,000 करोड़ का सरप्लस बना हुआ है, लेकिन प्रोडक्टिव आर्थिक जरूरतों के हिसाब से इसकी पर्याप्तता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं [24]। CRR पर विचार का मतलब है कि सेंट्रल बैंक अपने पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर नए रास्ते तलाश रहा है, जो रेगुलेटरी आवश्यकताओं और मार्केट की बदलती गतिशीलता के कारण सीमित हो गए हैं।
CRR की अनपेक्षित लागत
CRR, बैंकों द्वारा RBI के पास अनिवार्य रूप से रखी जाने वाली एक राशि है, जो वर्तमान में नेट डिमांड और टाइम लायबिलिटीज (NDTL) का 3% है [2, 10, 20, 30, 39, 49]। खास बात यह है कि इस रिजर्व पर बैंकों को कोई ब्याज नहीं मिलता, जिसका मतलब है कि उन पर सीधा वित्तीय बोझ पड़ता है। अनुमान है कि CRR के तहत रखे गए लगभग ₹7.5 लाख करोड़ पर, बैंकों को लगभग 5% की औसत डिपॉजिट कॉस्ट के आधार पर सालाना करीब ₹37,500 करोड़ का भारी-भरकम ब्याज खर्च उठाना पड़ता है [News text]। यह गैर-ब्याज वाली होल्डिंग बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी और लोन देने की क्षमता पर एक बड़ा दबाव डालती है। ऐसे में, अगर CRR को कम किया जाता है, तो बैंकों पर यह बोझ कम होगा और वे सीधे तौर पर कर्ज की दरें घटा सकेंगे, बजाय इसके कि उन्हें मॉनेटरी पॉलिसी द्वारा ऐसा करने के लिए कहा जाए [News text]। यह स्थिति अमेरिका और यूरो एरिया जैसे कई विकसित देशों से बिल्कुल अलग है, जहाँ अक्सर रिजर्व की जरूरतें शून्य या बहुत कम होती हैं और वे मजबूत रेगुलेटरी नॉर्म्स पर भरोसा करते हैं [23, 36]।
पारंपरिक लिक्विडिटी टूल्स की सीमाएं
RBI वर्तमान में लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल करती है, जिनमें ओवरनाइट और टर्म रेपो, ओपन मार्केट ऑपरेशन्स (OMOs) और फॉरेक्स स्वैप्स शामिल हैं [News text]। हालांकि, इन टूल्स की प्रभावशीलता पर बढ़ती बाधाएं आ रही हैं। OMOs, जिनमें RBI सरकारी सिक्योरिटीज खरीदती है, बैंकों के पास उपलब्ध स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेश्यो (SLR) होल्डिंग्स की वजह से सीमित हो रहे हैं। SLR 18% पर अनिवार्य है [2, 3, 10, 30, 49], और लिक्विडिटी कवरेज रेश्यो (LCR) की आवश्यकताओं के तहत बैंकों को हाई-क्वालिटी लिक्विड एसेट्स, अक्सर सरकारी सिक्योरिटीज, रखनी होती हैं। ऐसे में, इन सिक्योरिटीज को RBI को बेचने की बैंकों की क्षमता सीमित हो सकती है, खासकर जब LCR नॉर्म्स में संशोधन हो रहा है और वे 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाले हैं [17, 21, 32]। इसी तरह, फॉरेक्स स्वैप्स, जो रुपया लिक्विडिटी बढ़ाने और करेंसी को स्थिर करने में प्रभावी हैं, उनके अपने जोखिम हैं। इनमें डॉलर बेचते समय करेंसी में संभावित अस्थिरता और मैच्योरिटी पर RBI द्वारा डॉलर वापस खरीदते समय लिक्विडिटी की कमी का जोखिम शामिल है [5, 11, 25, 29, 33, 35]। चालू फाइनेंशियल ईयर में लगभग ₹6.6 लाख करोड़ के OMOs के व्यापक इस्तेमाल के बावजूद, बॉन्ड यील्ड्स में बढ़ोतरी को रोकना संभव नहीं हुआ है [47]।
चिंताएं और संरचनात्मक कमजोरियां
CRR में कटौती पर विचार, जो लिक्विडिटी के लिए फायदेमंद हो सकता है, जोखिमों से खाली नहीं है। CRR में बड़ी कमी से अतिरिक्त लिक्विडिटी आ सकती है, जिसे अगर सावधानी से मैनेज न किया जाए, तो यह महंगाई को बढ़ा सकती है, खासकर वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते व्यापारिक टकरावों के बीच [6, 31]। भारतीय बॉन्ड मार्केट पहले से ही FY2026-27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ के रिकॉर्ड सकल उधार कार्यक्रम के दबाव में है [40, 43, 48]। ब्याज दरों में कटौती और लिक्विडिटी बढ़ाने के बावजूद, बॉन्ड यील्ड्स में बढ़ोतरी भविष्य की सप्लाई और महंगाई की उम्मीदों के बारे में बाजार की चिंताओं को दर्शाती है [31, 47]। इसके अलावा, बैंकिंग सिस्टम को क्रेडिट ग्रोथ (लगभग 12%) और डिपॉजिट ग्रोथ (लगभग 10%) के बीच बढ़ती खाई का सामना करना पड़ रहा है, जिससे क्रेडिट-डिपॉजिट रेश्यो कई दशकों के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। यह असंतुलन बैंकों को महंगी बल्क डिपॉजिट पर निर्भर रहने के लिए मजबूर कर रहा है, जो वर्तमान लाभ की मजबूती के बावजूद नेट इंटरेस्ट मार्जिन्स (NIMs) को निचोड़ सकता है [43]। रुपये को स्थिर करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में RBI का हस्तक्षेप, हालांकि आवश्यक है, लिक्विडिटी को भी कम करता है, जिसके लिए अन्य टूल्स के साथ निरंतर संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होती है [29, 31]।
भविष्य का दृष्टिकोण और RBI का सक्रिय रुख
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने आश्वासन दिया है कि RBI "लिक्विडिटी मैनेजमेंट में सक्रिय" रहेगा और उत्पादक आवश्यकताओं व मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी सुनिश्चित करेगा [13, 19]। सेंट्रल बैंक का दृष्टिकोण सरकार के बैलेंस, करेंसी सर्कुलेशन और फॉरेक्स इंटरवेंशन में संभावित उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए, पहले से सक्रिय रहने का है [13]। फरवरी 2026 की पॉलिसी में स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता दिखती है, जिसमें ग्रोथ सपोर्ट और वैश्विक जोखिमों को संतुलित करने के लिए रेपो रेट को स्थिर रखा गया है [6, 24]। जैसे-जैसे RBI इन जटिलताओं से निपट रहा है, CRR का उपयोग करने की ओर कोई भी कदम इसके पारंपरिक टूलकिट से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान का प्रतीक होगा, जो वित्तीय बाजारों की बदलती परिस्थितियों और रेगुलेटरी परिदृश्यों के प्रति एक व्यावहारिक प्रतिक्रिया को दर्शाता है।