भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 17 जुलाई तक विदेशी मुद्रा से **$20.72 बिलियन** की जबरदस्त पूंजी जुटाई है। यह मुख्य रूप से नॉन-रेसिडेंट डिपॉजिट्स के जरिए आया है। इस बड़ी रकम से भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट (Balance of Payment) को काफी मजबूती मिली है और RBI को रुपये की अस्थिरता से निपटने के लिए और भी ताकत मिली है।
Detailed Coverage
RBI की विदेशी मुद्रा जुटाने की पहल
RBI ने 17 जुलाई तक अपनी खास विदेशी मुद्रा योजनाओं के जरिए कुल $20.72 बिलियन जुटाने में कामयाबी हासिल की है। इस पहल का मकसद विदेशी पूंजी को आकर्षित करना और भारतीय रुपये को स्थिर करना था, और शुरुआती नतीजों ने बाजार की उम्मीदों को पार कर दिया है। इस पूंजी का एक बड़ा हिस्सा, करीब $17.5 बिलियन, फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR) बैंक डिपॉजिट्स के जरिए आया है। ये इनफ्लो (inflows) भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट के लिए बेहद अहम हैं, जो दुनिया के साथ देश के वित्तीय लेन-देन का हिसाब रखता है।
2013 की तुलना में तेज रफ्तार
पैसे जुटाने की यह रफ्तार 2013 में RBI द्वारा शुरू किए गए ऐसे ही एक प्रोग्राम से काफी तेज है। जहां 2013 की पहल ने पहले सात हफ्तों में लगभग $10 बिलियन जुटाए थे, वहीं मौजूदा स्कीम ने बहुत कम समय में कहीं ज्यादा बड़ी रकम जमा कर ली है। यह तेज रफ्तार नॉन-रेसिडेंट भारतीयों और ग्लोबल निवेशकों का मौजूदा पॉलिसी फ्रेमवर्क पर मजबूत भरोसा दिखाती है, भले ही इंटरनेशनल ब्याज दरें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं।
रुपये और रिजर्व मैनेजमेंट पर असर
ये इनफ्लो (inflows) भारतीय रुपये के लिए एक मजबूत सहारा का काम कर रहे हैं, जो ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण दबाव में रहा है। चूंकि क्रूड ऑयल भारत का एक प्रमुख आयात है, इसलिए ऊंची कीमतें आमतौर पर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालती हैं। $20.72 बिलियन के इस इनफ्लो (influx) से RBI को करेंसी मार्केट में हस्तक्षेप करने के लिए और ज्यादा लचीलापन मिला है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि केंद्रीय बैंक अचानक आने वाले मार्केट झटकों से बचाने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
भविष्य का अनुमान और आर्थिक संकेत
अर्थशास्त्री चालू फाइनेंशियल ईयर के लिए भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट (Balance of Payment) के अपने अनुमानों को संशोधित कर रहे हैं। जबकि कुछ विश्लेषकों ने शुरू में मामूली सरप्लस की उम्मीद की थी, इस स्कीम की शुरुआती मजबूत प्रतिक्रिया से अब ज्यादा सकारात्मक पूर्वानुमान लगाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, बैलेंस ऑफ पेमेंट सरप्लस के अनुमान अब लगभग $25 बिलियन के आसपास हैं, हालांकि यह आंकड़ा ग्लोबल ऑयल कीमतों के रुझानों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। अगर ब्रेंट क्रूड की कीमतें $90 प्रति बैरल के करीब ऊंची बनी रहती हैं, तो आयात की लागत बढ़ सकती है, जिससे घरेलू वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए डॉलर के इन अतिरिक्त इनफ्लो (inflows) और भी महत्वपूर्ण हो जाएंगे।
आने वाले महीनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि FCNR डिपॉजिट्स में यह तेजी जारी रहती है या धीमी पड़ती है। निवेशक और बाजार पर्यवेक्षक कुल जमा राशि के अपडेट और रुपये पर लगातार दबाव के जवाब में केंद्रीय बैंक अपनी रिजर्व मैनेजमेंट की रणनीति को कैसे समायोजित करता है, इस पर नजर रखेंगे।
