भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आज बड़े भारतीय बैंकों के प्रमुखों के साथ एक अहम बैठक करने जा रहा है। इस मीटिंग का मुख्य एजेंडा फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक (FCNR-B) डिपॉजिट स्कीम में आ रही सुस्ती पर चर्चा करना है। उम्मीद से काफी कम, यानी जून में लॉन्च होने के बाद से अब तक केवल **$5-6 अरब** ही जमा हुए हैं।
ग्लोबल अनिश्चितता का असर
इस धीमी गति का एक बड़ा कारण दुनिया भर में बढ़ती अनिश्चितता है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की वजह से UAE, सिंगापुर और हांगकांग जैसे बड़े फाइनेंशियल हब में निवेशकों का सेंटिमेंट (Investor Sentiment) सतर्क हो गया है। ऐतिहासिक रूप से, ये क्षेत्र भारत के FCNR-B डिपॉजिट्स में बड़ा योगदान देते हैं। मौजूदा अस्थिरता के कारण बड़े इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) और हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (High-Net-Worth Individuals) अपनी रकम को अभी निवेश करने से कतरा रहे हैं, भले ही इस स्कीम में टैक्स बेनिफिट्स और लिवरेज (Leverage) के विकल्प मौजूद हैं।
रेट्स (Rates) को लेकर कन्फ्यूजन
बाहरी राजनीतिक जोखिमों के अलावा, बैंकिंग सेक्टर को इंटरनल प्राइसिंग (Pricing) की दिक्कतों का भी सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका में, निवेशकों की रिटर्न एक्सपेक्टेशन (Return Expectations) और बैंकों द्वारा ऑफर की जा रही ब्याज दरों के बीच एक बड़ा गैप है। RBI ने हेजिंग कॉस्ट (Hedging Costs) को कम करने और ज्यादा लिवरेज की इजाजत देने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन निवेशक अभी भी 14-15% के रिटर्न की मांग कर रहे हैं। यह उम्मीदों का अंतर बड़े बैंकों के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है।
इसके अलावा, छोटे बैंक जैसे AU स्मॉल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) और इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक (Equitas Small Finance Bank) ने FCNR-B रेट्स बढ़ाकर डिपॉजिट्स को आकर्षित करने की कोशिश की है। वहीं, मझोले प्राइवेट बैंक 7% से भी कम रेट्स ऑफर कर रहे हैं। निवेशक इन कम रेट्स की तुलना स्मॉल फाइनेंस बैंकों के आक्रामक ऑफर्स से कर रहे हैं, जिससे डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit Growth) पर असर पड़ रहा है। यूनाइटेड किंगडम (UK) के टैक्स नियमों में हालिया बदलावों ने भी इन डिपॉजिट्स की आफ्टर-टैक्स अपील को कम कर दिया है।
भारत के एक्सटर्नल बैलेंस पर असर
इन इनफ्लोज़ (Inflows) की धीमी रफ्तार भारत की इकोनॉमिक हेल्थ (Economic Health) के लिए चिंता का विषय है। फॉरेन करेंसी का मजबूत इनफ्लो करंट अकाउंट सरप्लस (Current Account Surplus) हासिल करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा था। $50 अरब के टारगेट के मुकाबले असल आंकड़े काफी पीछे हैं, जिससे यह चिंता बढ़ रही है कि भारत लगातार तीसरे साल करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) में रह सकता है। आज की मीटिंग के नतीजों पर सबकी नजरें रहेंगी कि क्या RBI इन उम्मीदों और ऑफर्स के बीच के अंतर को पाटने के लिए कोई और प्रोत्साहन या पॉलिसी एडजस्टमेंट (Policy Adjustment) लाता है।
