RBI Meeting: ब्याज दरों के बदलाव का पूरा फायदा आम ग्राहकों को क्यों नहीं मिल रहा?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI Meeting: ब्याज दरों के बदलाव का पूरा फायदा आम ग्राहकों को क्यों नहीं मिल रहा?

RBI की आगामी 7 अक्टूबर, 2026 की बैठक से पहले यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि सरकारी बैंक अपनी ब्याज दरों में बदलाव को ग्राहकों तक तेजी से क्यों नहीं पहुंचाते।

RBI की अगली मीटिंग 7 अक्टूबर, 2026 को होने जा रही है, जहां बढ़ती महंगाई और ग्लोबल दबावों के चलते ब्याज दरें 5.50% तक पहुंचने का अनुमान है। इस मीटिंग से पहले रिजर्व बैंक इस बात पर कड़ी नजर रख रहा है कि कमर्शियल बैंक उनकी पॉलिसी का फायदा आम आदमी तक कितनी तेजी से पहुंचा रहे हैं।

ब्याज दर ट्रांसमिशन का गैप

फरवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच, RBI ने रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की थी, लेकिन ग्राहकों के लोन की लागत उस अनुपात में कम नहीं हुई। आंकड़ों के मुताबिक, जहां रेपो रेट में बड़ी गिरावट आई, वहीं 'वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट' में उतनी कमी नहीं दिखी। यहाँ तक कि MCLR में भी केवल 40 बेसिस पॉइंट्स की ही गिरावट दर्ज की गई। इस देरी को फाइनेंशियल भाषा में 'स्लगिश ट्रांसमिशन' कहा जाता है।

सरकारी बनाम प्राइवेट बैंक

मार्केट डेटा बताता है कि प्राइवेट और विदेशी बैंक ब्याज दरों को एडजस्ट करने में सरकारी बैंकों (PSBs) के मुकाबले काफी तेज रहे हैं। सरकारी बैंक अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाने के लिए दरों में कटौती को टालते रहते हैं। चूंकि बैंकों को डिपॉजिट जुटाने के लिए भी ग्राहकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ता है, इसलिए वे लोन पर मिलने वाले ब्याज को कम करने में हिचकिचाते हैं। साथ ही, प्राइवेट बैंकों के लोन अक्सर बाहरी बेंचमार्क से जुड़े होते हैं, जिससे उनमें बदलाव ऑटोमैटिक हो जाता है।

अर्थव्यवस्था पर असर

जब बैंक रेट कट का फायदा ग्राहकों को नहीं देते, तो अर्थव्यवस्था को मिलने वाला बूस्ट कमजोर पड़ जाता है। यदि RBI भविष्य में दरें बढ़ाता है, तो अब यह देखना अहम होगा कि बैंक कितनी तेजी से लोन महंगा करते हैं, क्योंकि यही फैक्टर तय करेगा कि कंपनियों और घरों के लिए कर्ज का बोझ कितना बढ़ेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.