RBI का बड़ा फैसला: अब हर हफ्ते देनी होगी क्रेडिट की जानकारी, बैंकों में हलचल!

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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: अब हर हफ्ते देनी होगी क्रेडिट की जानकारी, बैंकों में हलचल!
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण नियम लागू किया है। अब से, उन्हें हर **दो हफ्तों** के बजाय, **हर हफ्ते** अपने ग्राहकों के क्रेडिट डेटा की जानकारी क्रेडिट ब्यूरो (Credit Bureaus) को देनी होगी। यह बड़ा बदलाव 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा।

RBI ने बदला क्रेडिट रिपोर्टिंग का तरीका

RBI के इस नए फरमान का मतलब है कि अब बैंकों को अपने ग्राहकों की क्रेडिट हिस्ट्री (Credit History) से जुड़ा डेटा क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियों (CICs) को हर हफ्ते भेजना होगा, जो कि पहले हर दो हफ्तों में होता था। इस कदम का मुख्य मकसद लोन (Loan) की मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करना, कर्जदारों के जोखिम का लगातार आकलन करना और लोन की क्वालिटी (Asset Quality) को बेहतर बनाना है। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव अंडरराइटिंग (Underwriting) के तरीकों को और मजबूत करेगा, जिससे बैंकों को सिर्फ लोन देते समय ही नहीं, बल्कि पूरे लोन पीरियड (Loan Period) के दौरान ग्राहक के जोखिम पर नजर रखने में मदद मिलेगी। इससे शुरुआती चेतावनी सिस्टम (Early Warning System) भी मजबूत होगा।

डिजिटल सिस्टम की बढ़ेगी मांग

इस नई साप्ताहिक रिपोर्टिंग की जरूरत को पूरा करने के लिए, बैंकों और NBFCs को अपने डिजिटल सिस्टम (Digital Systems) को और मजबूत करना होगा। इंडियन बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर, बिनोद कुमार ने कहा है कि 'डिजिटल लोन प्रोडक्ट्स (Digital Loan Products) इस माहौल में एक कारगर समाधान साबित हो सकते हैं, जहां लोन सैंक्शन (Sanction) के समय रियल-टाइम क्रेडिट ब्यूरो चेक (Real-time Bureau Check) बहुत महत्वपूर्ण हो जाएंगे।' इसका मतलब है कि संस्थानों को ऐसे सॉफ्टवेयर और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना होगा जो डेटा को आसानी से निकाल सकें, वेरिफाई कर सकें और साप्ताहिक तौर पर सबमिट कर सकें। हालांकि यह एक तकनीकी चुनौती है, पर इसे एक बार का इंटीग्रेशन टास्क (Integration Task) माना जा रहा है।

क्रेडिट ब्यूरो के सामने बड़ा डेटा वॉल्यूम चैलेंज

इक्विफैक्स इंडिया (Equifax India) और सीआरआईएफ हाई मार्क (CRIF High Mark) जैसी क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियों (CICs) के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी। उन्हें हफ्ते दर हफ्ते आने वाले डेटा की भारी मात्रा को संभालना होगा। डेटा की क्वालिटी (Data Quality) बनाए रखना और इस तेज गति से काम करना ऑपरेशनल (Operational) तौर पर एक बड़ी बाधा साबित हो सकता है। इक्विफैक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर, आदित्य चटर्जी ने अलग-अलग डेटा सबमिशन एनवायरनमेंट (Data Submission Environments) में तैयार रहने की बात कही है। वहीं, सीआरआईएफ हाई मार्क के COO, सुनील अगिथाकालिया ने बताया कि इस सिस्टम में हर हफ्ते कुछ डेटा जोड़ना होगा और महीने के अंत में पूरा डेटा फाइल सबमिट करनी होगी, जो मौजूदा हर दो हफ्तों में पूरे फाइल सबमिशन से काफी अलग है। नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों पर RBI जुर्माना भी लगा सकता है।

शुरू में बढ़ सकती हैं डिफॉल्टर की संख्या, पर लंबी अवधि में फायदा

बैंकरों का अनुमान है कि शुरुआती दौर में, खासकर माइक्रोफाइनेंस (Microfinance) सेक्टर में, डिफॉल्टर (Defaulters) की संख्या में थोड़ी बढ़ोतरी देखी जा सकती है। साप्ताहिक रिपोर्टिंग से कर्जदारों के भुगतान व्यवहार (Repayment Behaviour) की असल तस्वीर सामने आएगी। हालांकि, ईएसएएफ स्मॉल फाइनेंस बैंक के एमडी, के पॉल थॉमस का कहना है कि यह शुरुआती उछाल जल्द ही स्थिर हो जाएगा और लोन की क्वालिटी में सुधार आएगा, क्योंकि क्रेडिट अंडरराइटिंग (Credit Underwriting) बेहतर और वर्तमान ग्राहक डेटा (Current Customer Data) पर आधारित होगी।

डेटा सटीकता और ऑपरेशनल बोझ मुख्य जोखिम

इस नई प्रणाली के लिए सबसे बड़ी चिंता डेटा की सटीकता (Data Accuracy) और बढ़ते वर्कलोड (Workload) को संभालना है। क्रेडिट ब्यूरो को साप्ताहिक आधार पर डेटा की शुद्धता बनाए रखने में परेशानी हो सकती है। वहीं, छोटे NBFCs (Non-Banking Financial Companies) और रीजनल रूरल बैंक्स (Regional Rural Banks) जिनके पास पुरानी सिस्टम हैं, उनके लिए डेटा निकालने, वेरिफाई करने और सबमिट करने का काम तीन गुना बढ़ जाएगा, जो कि एक बड़ा ऑपरेशनल बोझ है। ऑटोमेशन (Automation) के बिना, व्यस्त समय में स्केलेबिलिटी (Scalability) एक मुद्दा बन सकती है। RBI के इस नियम का पालन न करने पर जुर्माना और कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) बढ़ सकती है। पेमेंट व्यवहार का तेजी से रिफ्लेक्शन (Reflection) जोखिम मूल्यांकन में सुधार करेगा, लेकिन अस्थायी वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहे कर्जदारों के लिए 'स्कोर शॉक' (Score Shock) पैदा कर सकता है, जिससे लोन की सामर्थ्य (Affordability) प्रभावित हो सकती है।

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