1 अक्टूबर से Reserve Bank of India ने सर्विस एक्सपोर्टर्स और फ्रीलांसरों के लिए नए नियम लागू किए हैं। अब विदेशी भुगतान प्राप्त करने के लिए 'Export Declaration Form' (EDF) भरना अनिवार्य होगा, ताकि फॉरेन एक्सचेंज के फ्लो पर बेहतर निगरानी रखी जा सके।
नियमों का दायरा और प्रक्रिया
Reserve Bank of India ने Foreign Exchange Management नियमों में बदलाव करते हुए अब सर्विस सेक्टर को भी इस दायरे में ले लिया है। अब तक यह नियम मुख्य रूप से फिजिकल गुड्स और सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट तक सीमित थे, लेकिन अब फ्रीलांसरों, कंसल्टेंट्स और इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर्स को भी हर इंटरनेशनल पेमेंट के लिए अपने बैंक में EDF फाइल करना होगा।
फाइलिंग और सुलह (Reconciliation) की चुनौती
नियमों के मुताबिक, सर्विस प्रोवाइडर्स को महीने भर के इनवॉइस को जोड़कर महीने की समाप्ति के 30 दिनों के भीतर एक कंसोलिडेटेड डिक्लेरेशन जमा करना होगा। यह कदम इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर EDF का मिलान Export Data Processing and Monitoring System (EDPMS) में आने वाली राशि से नहीं होता है, तो इनवॉइस 'आउटस्टैंडिंग' मार्क किए जा सकते हैं, जिससे भविष्य में ऑडिट के दौरान बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।
बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में अंतर
इस नियम के आने के बाद बैंकों की डिजिटल क्षमता का अंतर भी सामने आया है। Axis Bank जैसे बड़े संस्थान अपने प्लेटफॉर्म पर ऑटोमेटेड रिपोर्टिंग मॉड्यूल के जरिए इस प्रक्रिया को आसान बना रहे हैं, जबकि कई छोटे या ट्रेडिशनल बैंक अभी भी पुराने मैन्युअल कागजी काम पर निर्भर हैं। इससे फ्रीलांसरों को अलग-अलग बैंकों में अलग तरह के अनुभव का सामना करना पड़ रहा है।
फ्रीलांसरों की चिंताएं
स्वतंत्र पेशेवरों को इस बात का डर है कि पहले से मौजूद GST रिपोर्टिंग और बैंक पर्पस कोड के साथ यह एक अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ बन जाएगा। हालांकि RBI ने कुछ छोटे असाइनमेंट्स और पर्सनल ट्रांजेक्शन के लिए छूट के संकेत दिए हैं, लेकिन अभी तक स्पष्ट गाइडलाइन्स का अभाव है। विशेषज्ञों की सलाह है कि जब तक नियम पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाते, तब तक प्रोफेशनल्स अपने बैंक से संपर्क कर फाइलिंग प्रक्रिया को सही ढंग से समझ लें।
