डिजिटल पेमेंट की सुरक्षा को RBI का बूस्टर डोज
डिजिटल फाइनेंशियल इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा उपायों का एक पूरा पैकेज जारी किया है। छोटे ट्रांजैक्शन में होने वाली धोखाधड़ी के शिकार ग्राहकों को ₹25,000 तक की भरपाई देने का प्रस्ताव इसी कड़ी का हिस्सा है। यह कदम बैंकों और अन्य फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स की जवाबदेही तय करने और ग्राहकों को डिजिटल पेमेंट की दुनिया में अधिक सुरक्षित महसूस कराने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।
RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में हुई मॉनेटरी पॉलिसी रिव्यू मीटिंग में इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि RBI अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन के मामले में ग्राहकों की देनदारी (liability) से जुड़े अपने 2017 के फ्रेमवर्क की भी समीक्षा कर रहा है। टेक्नोलॉजी में तेजी से हो रहे बदलावों और फ्रॉड के बढ़ते तरीकों को देखते हुए यह समीक्षा बेहद अहम है। RBI जल्द ही इस पर सार्वजनिक परामर्श के लिए ड्राफ्ट गाइडलाइन्स जारी करेगा।
इसके अलावा, RBI डिजिटल पेमेंट्स की सुरक्षा को और पुख्ता बनाने के लिए एक डिस्कशन पेपर भी लाने वाला है। इसमें 'लैग्ड क्रेडिट' (lagged credit) और 'एडिशन ऑथेंटिकेशन' (additional authentication) जैसे उपायों पर विचार किया जाएगा, जो विशेष रूप से सीनियर सिटीजन्स जैसे कमजोर यूजर ग्रुप्स को फ्रॉड से बचाने में मदद करेंगे, जबकि ट्रांजैक्शन की सुविधा में कोई बाधा न आए।
बढ़ते डिजिटल फ्रॉड पर लगाम लगाने की कोशिश
ये नए नियम ऐसे समय में आ रहे हैं जब देश में डिजिटल फ्रॉड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025 में बैंकों ने कार्ड और इंटरनेट फ्रॉड के कुल 13,516 मामले दर्ज किए, जिनकी कुल वैल्यू ₹520 करोड़ थी। वहीं, FY25 के शुरुआती 10 महीनों में ही डिजिटल फाइनेंशियल फ्रॉड के 2.4 मिलियन मामले सामने आए, जिनमें कुल ₹4,245 करोड़ की धोखाधड़ी हुई। यह स्थिति डिजिटल पेमेंट सिस्टम में मजबूत सुरक्षा प्रोटोकॉल और स्पष्ट जवाबदेही ढांचे की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है।
बैंकों और Fintech सेक्टर पर क्या होगा असर?
प्रस्तावित उपायों से बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (NBFCs) पर कंप्लायंस का बोझ और ऑपरेशनल एडजस्टमेंट की जरूरत बढ़ेगी। वित्तीय संस्थानों को अपने फ्रॉड डिटेक्शन और प्रिवेंशन मैकेनिज्म को और बेहतर बनाना होगा। 2017 के कस्टमर लायबिलिटी फ्रेमवर्क की समीक्षा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अनधिकृत ट्रांजैक्शन के मामलों में ग्राहक और बैंक की जिम्मेदारियों को फिर से परिभाषित करेगी। पहले जहां ग्राहकों को अपनी लायबिलिटी सीमित रखने के लिए अक्सर 90 दिनों के भीतर फ्रॉड की रिपोर्ट करनी पड़ती थी, वहीं नए नियम इसमें बदलाव ला सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई रेगुलेटरी बॉडीज डिजिटल फाइनेंस में उपभोक्ता संरक्षण पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। भारत का यह कदम फिनटेक सेक्टर में मजबूत रेगुलेशन की ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप है। भारत का फिनटेक सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, और डिजिटल पेमेंट मार्केट के 2034 तक $33.5 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें 16.1% की CAGR से ग्रोथ देखी जा रही है। RBI के ये हस्तक्षेप, भले ही कंप्लायंस की लागत बढ़ाएं, लेकिन इनका मुख्य उद्देश्य कंज्यूमर के विश्वास और सुरक्षा के मजबूत आधार पर इस ग्रोथ को सस्टेनेबल बनाना है, जिससे भारत की डिजिटल इकोनॉमी की लॉन्ग-टर्म स्थिरता और विश्वसनीयता मजबूत होगी।