RBI Liquidity Squeeze: सिस्टम से अचानक गायब हुई नकदी, ₹46,200 करोड़ पर पहुंचा बैंकिंग कैश

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI Liquidity Squeeze: सिस्टम से अचानक गायब हुई नकदी, ₹46,200 करोड़ पर पहुंचा बैंकिंग कैश

बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की भारी किल्लत हो गई है। सितंबर में जो कैश ₹11 लाख करोड़ था, वह अब गिरकर मात्र ₹46,200 करोड़ रह गया है। RBI रुपये को बचाने के लिए सिस्टम से कैश सोख रहा है, जिससे शॉर्ट-टर्म कर्ज लेना महंगा हो गया है।

रुपये को बचाने की कसरत

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में लिक्विडिटी का स्तर बुरी तरह लड़खड़ा गया है। सितंबर महीने में बैंकिंग सिस्टम में ₹11 लाख करोड़ की जो नकदी मौजूद थी, वह अब घटकर केवल ₹46,200 करोड़ रह गई है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जानबूझकर सिस्टम से यह नकदी निकाली है ताकि रुपये की वैल्यू में हो रही उठापटक को रोका जा सके और सट्टेबाजों पर लगाम कसी जा सके।

कर्ज क्यों हो गया महंगा?

सेंट्रल बैंक द्वारा सिस्टम से पैसा कम करने का सीधा असर यह हुआ है कि बैंकों और कंपनियों के लिए शॉर्ट-टर्म फंडिंग महंगी हो गई है। मनी मार्केट में इसका असर साफ दिखने लगा है, जहां तीन और छह महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) की दरें 40 से 50 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ गई हैं। यह पिछले सात महीनों का उच्चतम स्तर है।

बैंकों के मुनाफे पर दबाव

जैसे-जैसे बैंकों के लिए पैसा उधार लेना महंगा हो रहा है, उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि बैंक इस बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाते हैं या लोन की ब्याज दरों को बढ़ाकर इसे ग्राहकों पर डाल देते हैं।

आगे क्या होगा?

यह लिक्विडिटी टाइटनिंग सिर्फ बैंकों तक सीमित नहीं रहेगी। बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां और NBFCs जो अपनी डेली ऑपरेशंस के लिए कमर्शियल पेपर पर निर्भर हैं, उन्हें अब ज्यादा ब्याज चुकाना होगा। अगर बाजार में नकदी की यह कमी बनी रहती है, तो आने वाले समय में लोन की ग्रोथ धीमी हो सकती है या कर्जदारों के लिए ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। अब निवेशकों की नजरें बैंकों के आने वाले नतीजों पर टिकी हैं, जहां मैनेजमेंट यह साफ करेगा कि वे इस दबाव से कैसे निपट रहे हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.