मध्यम-आकार की कंपनियों के लिए लेंडिंग में तेज़ी
RBI के कैपिटल चार्ज रूल्स (Capital Charge Rules) में ये बदलाव 1 अप्रैल, 2027 से प्रभावी होंगे और इनका मकसद प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों तक लोन पहुंचाना आसान बनाना है। 'रेगुलेटरी रिटेल' लोन के लिए सीमा ₹7.5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने से ज़्यादा व्यक्तियों और छोटे बिजनेसेज़ को फेवरबल रिस्क वेट (Favorable Risk Weights) मिल सकेगा। इसके अलावा, 150% रिस्क वेट वाले बड़ी अनरेटेड कॉर्पोरेट और NBFC लोन के लिए ₹500 करोड़ की नई कैप मिड-साइज़्ड कंपनियों और उनके लेंडर्स के लिए बड़ी राहत है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कदम इन बिजनेसेज़ के लिए लेंडिंग कैपेसिटी (Lending Capacity) को बढ़ावा देंगे, जो भारत की ग्रोथ के लिए अहम हैं।
नियमों को सरल बनाना और वैश्विक मानकों को पूरा करना
फाइनल किए गए रूल्स (Finalised Rules) वैश्विक Basel III स्टैंडर्ड्स के साथ भारत के फाइनेंशियल रूल्स को अलाइन (Align) करने के RBI के कमिटमेंट को दिखाते हैं। अनरेटेड बैंक लोन पर रिस्क वेट (Risk Weight) को सिंपलीफाई किया गया है। अब लॉन्ग-टर्म लोन के लिए 100% और शॉर्ट-टर्म लोन के लिए 50% का फिक्स्ड रिस्क वेट होगा, जो पहले के प्रपोज़्ड ग्रेडिंग सिस्टम की तुलना में कंप्लायंस (Compliance) को आसान बनाता है। RBI ने इंटरनल चेक्स (Internal Checks) के आधार पर ऑटोमैटिक रिस्क वेट बढ़ाने के प्लान को भी हटा दिया है, जिससे कैपिटल नीड्स (Capital Needs) में ज़्यादा सर्टेनिटी (Certainty) आएगी। विदेशी बैंकों की ब्रांचेज़ को अपनी पेरेंट कंपनी की रेटिंग (Parent Company Ratings) इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी गई है, जो एक प्रैक्टिकल कदम है।
कमर्शियल रियल एस्टेट के लिए जारी चिंताएं
कुछ लेंडिंग लिमिट्स (Lending Limits) को आसान बनाने के बावजूद, RBI का कंस्ट्रक्शन के तहत कमर्शियल रियल एस्टेट (Commercial Real Estate) प्रोजेक्ट्स के लिए सख्त रिस्क वेट बनाए रखने का फैसला इस सेक्टर की वोलेटिलिटी (Volatility) को लेकर चल रही चिंताओं को दर्शाता है। इससे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में निवेश धीमा पड़ सकता है और उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। 1 अप्रैल, 2027 तक का लंबा इम्प्लीमेंटेशन टाइमलाइन (Implementation Timeline) बैंकों के लिए एक चुनौती पेश करता है। साथ ही, 'रेगुलेटरी रिटेल' की वाइडर डेफिनिशन (Wider Definition) एक हिडन रिस्क (Hidden Risk) पैदा कर सकती है, यदि लेंडर्स अपनी रिस्क असेसमेंट (Risk Assessment) और ओवरसाइट (Oversight) को मजबूत नहीं करते हैं।
