पूंजी का स्थिर प्रवाह बढ़ाने की रणनीति
RBI का यह बड़ा कदम, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के लिए वॉलंटरी रिटेंशन रूट (VRR) के तहत ₹2.5 ट्रिलियन के निवेश की सीमा को हटाना, भारत के डेट मार्केट में लंबी अवधि और स्थिर पूंजी के प्रवाह को बढ़ावा देने की एक अहम रणनीति को दर्शाता है। साल 2020 में लागू की गई यह सीमा अब विदेशी निवेशकों के लिए बाधा नहीं बनेगी। अब उनके निवेश मौजूदा, व्यापक सिक्योरिटी कैटेगरी की सीमाओं के अधीन होंगे, जिससे उन्हें कैपिटल लगाने में कहीं ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी। जानकारों का मानना है कि इस कदम से मार्केट में अस्थिर शॉर्ट-टर्म फ्लोज़ का असर कम होगा और वैश्विक वित्तीय टाइटनिंग और भारत की बढ़ती घरेलू उधारी की ज़रूरतों के बीच विदेशी भागीदारी को मज़बूती मिलेगी।
डेरिवेटिव्स से बाजार को मिलेगी नई धार
RBI ने सिर्फ VRR कैप हटाकर ही संतुष्ट नहीं हुआ, बल्कि देश के वित्तीय बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर को और मज़बूत करने के लिए एक व्यापक रणनीति पेश की है। केंद्रीय बैंक ने कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स पर डेरिवेटिव्स (derivatives) और टोटल रिटर्न स्वैप्स (Total Return Swaps) के लिए ड्राफ्ट फ्रेमवर्क भी जारी किए हैं। ये नए वित्तीय साधन (instruments) निवेशकों और इश्यूअर्स को बेहतर रिस्क मैनेजमेंट (risk management) के मौके देंगे। उम्मीद है कि इससे भारतीय बॉन्ड मार्केट, इंश्योरेंस और पेंशन फंड जैसे संस्थागत निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनेगा, जो लंबी अवधि के स्थिर एसेट्स में निवेश को प्राथमिकता देते हैं।
रियल इकोनॉमी तक पहुंचेगा सस्ता कर्ज
इन रेगुलेटरी और मार्केट डेवलपमेंट पहलों का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की उम्मीद है। श्रिरम फाइनेंस (Shriram Finance) के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन, उमेश रेवांकर (Umesh Revankar) का कहना है कि इन सुधारों से मैक्रोइकॉनोमिक स्थिरता के साथ मिलकर, मार्केट की लिक्विडिटी (liquidity) को सीधे MSMEs (Micro, Small, and Medium Enterprises) और खुदरा कर्जदारों (self-employed borrowers) के लिए अधिक भरोसेमंद और सही कीमत वाले कर्ज (credit) में बदला जा सकता है। इसका मतलब यह है कि इस पॉलिसी का फ़ायदा केवल वित्तीय बाजारों तक सीमित न रहकर, छोटे और मध्यम व्यवसायों की ग्रोथ को भी सहारा देगा।
पॉलिसी शिफ्ट का संदर्भ
यह नीतिगत बदलाव ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ब्याज दरें (interest rates) ऊंची बनी हुई हैं, लेकिन भारत के डोमेस्टिक बॉन्ड मार्केट को फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए सरकार के बड़े उधार (government borrowing) लक्ष्यों को पूरा करने की ज़रूरत है। इस लिबरलाइज़ेशन (liberalisation) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत, दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले, लंबी अवधि के डेट कैपिटल के लिए एक आकर्षक डेस्टिनेशन बना रहे। क्रेडिट डेरिवेटिव प्रोविजन्स (credit derivative provisions) को समेकित (consolidated) करने का प्रस्ताव, जिसमें पहले से मौजूद क्रेडिट डिफ़ॉल्ट स्वैप्स (credit default swaps) भी शामिल हैं, बाज़ार के विस्तार के साथ काउंटरपार्टी और क्रेडिट रिस्क को संभालने के लिए एक परिपक्व (mature) दृष्टिकोण को दर्शाता है।