RBI का NBFCs के लिए बड़ा ऐलान
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के टर्म मनी मार्केट (Term Money Market) को नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए खोल दिया है। इस पॉलिसी बदलाव का मुख्य मकसद इकोनॉमी में लिक्विडिटी (Liquidity) को बढ़ाना और मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) के असर को बेहतर करना है। उम्मीद है कि इससे शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म इंटरेस्ट रेट्स के बीच एक क्लियर कनेक्शन बनेगा।
NBFCs के लिए फंड जुटाने के नए रास्ते
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि इस फैसले से NBFCs को पैसा जुटाने के लिए और भी कई विकल्प मिलेंगे। अब वे सिर्फ ओवरनाइट मार्केट (Overnight Market) पर निर्भर नहीं रहेंगे, जिससे लिक्विडिटी मैनेजमेंट (Liquidity Management) का एक ज़्यादा स्टेबल तरीका मिलेगा। हालांकि, मार्केट के 'अनसिक्योर्ड' (Unsecured) होने को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, इसलिए रिस्क को मैनेज करने के लिए स्ट्रिक्ट लिमिट्स और मजबूत सुरक्षा उपायों की ज़रूरत होगी।
क्या सच में कम होंगी उधारी की लागत?
NBFCs का मानना है कि भले ही यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन टर्म मनी मार्केट में उधारी की लागत शायद कमर्शियल पेपर (Commercial Paper) जैसे शॉर्ट-टर्म इंस्ट्रूमेंट्स के बराबर ही रहेगी। संभवतः, मार्केट में उधारी की अवधि 90 दिनों तक ही सीमित रहेगी, क्योंकि इससे ज़्यादा समय के लिए एक्टिविटी कम रहने की उम्मीद है। फिलहाल, बेंचमार्क टर्म मनी रेट्स करीब 6.5 प्रतिशत के आसपास हैं। लेकिन, NBFCs के लिए उधारी की लागत कमर्शियल पेपर (CP) रेट्स से बहुत अलग नहीं हो सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि बैंक्स (Banks) और प्राइमरी डीलर्स (Primary Dealers), जिनकी क्रेडिट रेटिंग ज़्यादा मज़बूत है, उन्हें अक्सर बेहतर रेट्स मिलते हैं। इसलिए, सिर्फ मार्केट में एंट्री करने से सस्ता फंड मिलना तय नहीं है।
मनी मार्केट में ग्रोथ की उम्मीद
अभी तक, केवल बैंक्स (Banks) और स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर्स (Standalone Primary Dealers) ही टर्म मनी मार्केट में हिस्सा ले सकते थे। NBFCs के शामिल होने से मार्केट एक्टिविटी बढ़ने और वॉल्यूम में ग्रोथ की उम्मीद है, जिससे एक मज़बूत फाइनेंशियल सिस्टम बनाने में मदद मिलेगी। RBI का यह कदम भारत के मनी मार्केट्स को ज़्यादा कनेक्टेड और एफिशिएंट बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।