रेपो रेट पर 'स्टेटस को' की उम्मीद
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) 3 जून से अपनी तीन दिन की अहम बैठक शुरू कर रही है। 5 जून को आने वाले नतीजों का इंतजार है, लेकिन ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बेंचमार्क रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होगा और यह 5.25% पर ही बना रहेगा। RBI इस फैसले से घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देने और वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, महंगे कच्चे तेल और कमजोर होते रुपये, से निपटने की कोशिश करेगा।
हालांकि, खुदरा महंगाई (Retail Inflation) अभी भी RBI के 4% के टारगेट रेंज में है, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना RBI के लिए चिंता का सबब है। पिछले 150 दिनों में रुपया काफी कमजोर हुआ है। ऐसे में, RBI ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी के बजाय लिक्विडिटी मैनेजमेंट (Liquidity Management) और अन्य उपायों पर ज्यादा ध्यान दे सकता है।
महंगाई और ग्रोथ का संतुलन
आर्थिक अनुमानों को तेजी से बदला जा रहा है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते एनर्जी इम्पोर्ट बिल और मॉनसून के अनुमानों में गिरावट के कारण चालू फाइनेंशियल ईयर में CPI महंगाई 4.8% से बढ़कर 5.1% तक जा सकती है। वहीं, GDP ग्रोथ पर भी दबाव दिख रहा है, कुछ अनुमानों के अनुसार यह 6.3% से 6.6% के बीच रह सकती है।
यह RBI के लिए एक मुश्किल स्थिति है। एक तरफ जहां हाउसिंग सेक्टर में धीमी पड़ती क्रेडिट ग्रोथ को सहारा देना है, वहीं दूसरी तरफ आयातित महंगाई (Imported Inflation) को काबू में रखना है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने साल की शुरुआत की स्थिरता को खत्म कर दिया है, जिससे RBI के महंगाई-नियंत्रण के लक्ष्य पर असर पड़ सकता है।
होम बायर्स के लिए क्या है मायूसी?
जो लोग होम लोन की EMI कम होने का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें फिलहाल निराशा ही हाथ लगेगी। मौजूदा समय में पॉलिसी रेट (5.25%) और रिटेल लेंडिंग रेट्स के बीच बड़ा अंतर है। बैंकों से मिलने वाले लोन पर ब्याज दरें 7.10% से लेकर 11.90% तक चल रही हैं, जो लेंडर और कस्टमर की क्रेडिट प्रोफाइल पर निर्भर करती हैं। बैंक अपनी नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) को बचाने के लिए पहले की रेट कट को ग्राहकों तक पहुंचाने में धीमे रहे हैं।
इसके अलावा, ऑल-इंडिया हाउस प्राइस इंडेक्स (All-India House Price Index) में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। चौथी तिमाही में इसमें 4.2% का उछाल आया है। डेवलपर्स के लिए भी राहत कम है, क्योंकि लगातार बढ़ती कंस्ट्रक्शन लागत के कारण मार्जिन पर दबाव बना हुआ है।
आगे का रास्ता
RBI की ओर से आने वाले पॉलिसी स्टेटमेंट में 'सावधानी' झलकने की उम्मीद है। RBI से इस बात के संकेत मिलने की संभावना कम है कि जल्द ही ब्याज दरों में कटौती का चक्र शुरू होगा। फोकस सिस्टमैटिक लिक्विडिटी (Systematic Liquidity) बनाए रखने पर रहेगा, ताकि एनर्जी और करेंसी मार्केट के झटकों को संभाला जा सके। रियल एस्टेट सेक्टर और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए इसका मतलब है कि ऊंची ब्याज दरों का माहौल बना रहेगा। ब्याज दरों में किसी भी बड़ी कटौती के लिए 2026 के दूसरे छमाही तक इंतजार करना पड़ सकता है, और यह कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगा।
